चारधाम सड़क परियोजना से गंगा के हिमालयी पर्यावरण को क्षति-रेवती रमण

( अनुराग शुक्ला )
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार) । 30 साल से सिर्फ गंगाजल का सेवन करनेवाले गंगापुत्र राज्यसभा सासंद कुवंर रेवती रमण सिंह ने चारधाम सड़क परियोजना पर सड़क की चौड़ाई को लेकर विरोध दर्ज किया है कि परियोजना के नाम पर हिमालयी पर्यावरण से छेड़छाड़ प्रकृति के खिलाफ है प्रकृति इसका बदला केदारनाथ त्रासदी के रूप में लेता हैं इसलिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ बन्द होना चाहिए ।
उन्होंने कहा कि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने चारधाम सड़क चौड़ीकरण की परियोजना में अपनाए पुराने मानक (DL-PS, 12 मीटर) चारधाम घाटियों के लिए लागू किये जिनके चलते हिमालयी पर्यावरण की भारी क्षति हुई और आज चारधाम क्षेत्र में भूस्खलन बढ़ गए हैं, पिछले कई दिनों से ये राजमार्ग भारी भूस्खलनों से बंद चल रहे हैं. क्लाइमेट चेंज के इस समय में अति संवेदनशील हिमालय के पर्यावरण से ऐसा खिलवाड़ आपदा को निमंत्रण है. हिमालयी पर्यावरण के खिलवाड़ का नतीजा केवल उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश को भुगतना पड़ेगा. यह बात राजमार्ग मंत्रालय की प्लानिंग ज़ोन ने भी वर्ष 2018 में स्वीकार ली थी तथा मार्च-2018 में एक सर्कुलर निकाल पहाड़ी क्षेत्रों के लिए पर्यावरण के लिहाज से राजमार्ग के मानक संशोधित कर Intermediate lane (7-8 मीटर) कर दिए थे. किन्तु फिर भी चारधाम योजना में पुराने हानिकारक मानकों (DL-PS) के तहत ही चौड़ीकरण जारी रखा गया. इस नए सर्कुलर को सर्वोच्च न्यायालय तथा हाई पावर कमिटी (चोपड़ा कमिटी) के संज्ञान में भी अंत तक नहीं लाया गया. आज जब सुप्रीम कोर्ट की चोपड़ा कमिटी ने इसका खुलासा किया तो अध्यक्ष रवि चोपड़ा और कुछ स्वतंत्र सदस्य जो ये बात उठा रहे थे, उनके खिलाफ कमिटी में मौजूद बहुसंख्यक सरकारी तबका एक जुट हो गया और रिपोर्ट में ये तथ्य दबाने के प्रयास हुए. अध्यक्ष ने दबाव में न आते हुए यह सब तथ्य रिकॉर्ड करते हुए अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को निर्णय हेतु भेज दी है जिसकी हम सराहना और समर्थन करते हैं।

सांसद ने कहा कि आज रोज खबरों में है कि किस तरह हिमालयी पर्यावरण बिगड़ता जा रहा है, बरसात में बाढ़ आपदा में भारी जान-माल की क्षति हो रही है तथा गर्मियों में जल-श्रोत सूख रहे हैं. इसका असर मैदानी भागों में भी देखने को मिल रहा है. सुप्रीम कोर्ट की चोपड़ा कमिटी ने यह भी बताया है कि चारधाम परियोजना के नाम पर अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिमालयी घाटियों में 50 हजार से ऊपर पेड़ काट दिए और 700 हेक्टेयर जंगल साफ़ कर दिया है, रिपोर्ट पर्यावरणीय विभीषिका को उजागर कर यह भी खुलासा करती है कि-
१. परियोजना की प्लानिंग में संवेदनशील हिमालयी घाटियों की धारण क्षमता (carrying capacity) का संज्ञान नहीं लिया गया.
२. यह सड़क चौडीकरण का तरीका आपदा के लिहाज से अधिक संवेदनशील है. कई पेड़, वन और हरित क्षेत्र जो भूस्खलन और पहाडी ढालों के खिसकने से नष्ट हुआ है उसकी तो कोई गिनती तक नहीं.
३. पुराने मानक के अनुसार अत्यधिक चौड़ीकरण के लिए बहुत अंदर तक (आम तौर से २४ मीटर तक) पहाड़ी ढलानों का कटान करने के कारण कई भूस्खलन क्षेत्र पैदा हो गए हैं, पिछले कुछ महीनों में 40 से ऊपर भूस्खलन की घटनाएं दर्ज हुई हैं. दर्जनों स्थान पर पहाडी ढाल भूस्खलन संवेदी बन चुके हैं.
४. मलबा भी अधिक पैदा हो रहा है और इसका निस्तारण घाटियों में ही होने के चलते मलबे के बड़े-बड़े ढेर खड़े हो गए हैं. मलबे का अवैध और अवैज्ञानिक निस्तारण खेत-खलिहान और जान-माल की हानि सहित आपदा का सबब बन रहा है.
५. हिमालयी जीव जंतुओं के आवागमन और सुरक्षा का परियोजना में कोई ध्यान नहीं रखा गया. डंपिंग से नदियों का बहुमूल्य पारिस्थितिकीय तंत्र दुष्प्रभावित हुआ है.
६. परियोजना में हिमालयी जलश्रोतों और नदियों की सुरक्षा का कोई विचार नहीं किया गया. गंगा और उसकी सहयोगी जलधाराओं में मलबे का निस्तारण, घाटी के जंगलों, हरित क्षेत्र की क्षति और पहाड़ कटान से जलश्रोतों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है.
७. स्थानीय जरुरत और तीर्थयात्रियों के लिए पैदल फूटपाथ तक योजना में शामिल नहीं किया. यह योजना तीर्थाटन नहीं बल्कि पर्यटन के स्वरुप से डिजाइन की गयी वह भी धारण क्षमता का विचार किये बिना.

इस तरह से परियोजना के वैज्ञानिक स्वरुप को नजरअंदाज कर इसके राजनीतिक स्वरुप के चलते आज हिमालय के पर्यावरण का भारी विनाश जारी है. कई जगह भूस्खलनों के चलते चीन सीमा को जाने वाले ये राजमार्ग बाधित हैं और परिणामस्वरूप हमारी सीमाओं की सुरक्षा भी प्रभावित हो रही हैं. इस प्रकार सीमा सुरक्षा की दृष्टि से भी परियोजना हानिकारक साबित हो रही है.
यदि MoRTH के प्लानिंग ज़ोन ने अपना निष्कर्ष चारधाम पर तभी लागू कर सुधार कर दिया होता तो देश के हजारों करोड रुपये ऐसे पानी में बहने से बचते, अपेक्षाकृत काफी कम खर्च पर बेहतरीन चारधाम राजमार्ग सुधारीकरण और अपग्रेड होता तथा सैकड़ों हेक्टेयर वन भूमि तथा हज़ारों हिमालयी वृक्ष कटने से बचते और न ही सर्वोच्च न्यायालय को यह कमिटी बनाने की जरुरत पड़ती.
हम सुप्रीम कोर्ट हाई पावर कमिटी को प्रभावित करने के अध्यक्ष की रिपोर्ट का समर्थन करते हैं जो हिमालयी पर्यावरण, देश और सीमा सुरक्षा के हित में हैं. और केंद्र सरकार से मांग करते हैं कि इसकी सिफारिशों को हिमालय के हित में तत्काल लागू किया जाए।
पूर्व सपा प्रदेश प्रवक्ता विनय कुशवाहा ने बताया कि सासंद कुवंर रेवती रमण सिंह ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी से गंगा व हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण के लिए चारधाम सड़क परियोजना की चौड़ीकरण को सीमित करने में हस्तक्षेप करें क्योंकि इस परियोजना के अन्तर्गत लाखों देवदार के कीमती वृक्ष कट गये जो कई सालों में तैयार होतें हैं ।
उन्होंने कहा कि चारधाम यात्रा भारतीय संस्कृति सभ्यता का देवस्थान हैं इसको हनीमून पर्यटन या पब- शराब का अड्डा ना बनाया जाय जिससे आम भारतीयों के भावना को ठेस पहुंचे।

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