
प्रयागराज ( अनुराग दर्शन समाचार )। लक्ष्मीनारायणमंदिर सेवा ट्रस्ट के परमाध्यक्ष :अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्रीस्वामीघनश्यामाचार्य जी महाराज प्रयागराज के पावन सानिध्य में आज त्रिवेणी संगम तट पर वैदिक परम्परानुसार जो ऋषियो द्वारा वर्णित ब्राह्मणो का मुख्य कर्म है श्रावणी उपाकर्म किया गया जिसमें जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्रीस्वामी धराचार्य जी महाराज एवं स्वामी अच्युतप्रपन्नाचार्य जी महाराज एवं आश्रमों के बटुक व आचार्य गणों के द्वारा दिव्य श्रावणीकर्म सम्पन्न कराया गया जिसकी महत्त्व पूज्य जगद्गुरु स्वामी घनश्यामाचार्य जी महाराज ने कहा की प्राचीनकाल में श्रावणी उपाकर्म का ज्यादा महत्व था जबकि बालकों को गुरुकुल भेजा जाता था। उन्हें द्विज बनाया जाता था और उनमें वैदिक संस्कार डाले जाते थे। हालांकि वर्तमान में यह सब नहीं होता बस यज्ञोपतिव संस्कार और तर्पण ही अब रह गया है। जो वैदिक या वेदपाठी ब्राह्मण है वे यह कर्म करते हैं या जिन्हें ब्राह्मण बनना हो वे भी ये कर्म करते हैं। श्रावण पूर्णिमा के दिन यदि ग्रहण या संक्रांति हो तो श्रावणी उपाकर्म श्रावण शुक्ल पंचमी को करना चाहिए।
क्या होता है श्रावणी उपाकर्म में : दसविधि स्नान कर मनाया जाता है श्रावणी पर्व। इसमें पितरों तथा आत्मकल्याण के लिए मंत्रों के साथ हवन यज्ञ में आहुतियां दी जाती है। इस महत्वपूर्ण दिन पितृ-तर्पण और ऋषि-पूजन या ऋषि तर्पण भी किया जाता है। ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद और सहयोग मिलता है जिससे जीवन के हर संकट समाप्त हो जाते हैं।
श्रावणी उपाकर्म उत्सव में वैदिक विधि से हेमादिप्राक्त, प्रायश्चित संकल्प, सूर्याराधन, दसविधि स्नान, तर्पण, सूर्योपस्थान, यज्ञोपवीत धारण, प्राणायाम, अग्निहोत्र व ऋषि पूजन किया जाता है। तथा यज्ञोपवीत पूजन करके धारण किया जाता है शास्त्रों में श्रावणी को द्विज जाति का अधिकार व कर्तव्य बताया और कहा कि वेदपाठी ब्राह्मणों को तो इस कर्म को किसी भी स्थिति में नहीं त्यागना चाहिए