बदलते परिवेश ने छीन लिया लोक कलाओं का अस्तित्व

गावो से विलुप्त हो रही कजरी एवम झूलों का मौसम

(अनुराग शुक्ला / रमेश तिवारी)

कोरांव, प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार) देश में लगातार बढ़ती हुई पाश्चात्य सभ्यता एवम जिंदगी की चकाचोंध ने भारतीय लोक कला एवं गवई माटी में रचे बसे गीतों परंपराओं के माहौल को पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया है। उसका असर यह है कि सावन का महीना बीतने की कगार पर है लेकिन गांव में अब पहले जैसा न तो कहीं बाग बगीचे में झूला दिख रहा है न तो कजरी की धुन सुनाई पड़ रही है। प्राचीन काल से ही देश में नागपंचमी के त्यौहार से ग्रामीण इलाकों में कजरी की धूम सुनाई पड़ने लगती थी और गांव में झूले पड़ जाते थे ।जहां भारी संख्या में पुरुष महिलाएं 1 साथ मौसमी गीतों का आनंद भी उठाते थे ।इसके अलावा गांव में विभिन्न स्थानों पर दंगल का आयोजन किया जाता था जहां पर दूरदराज से आने वाले पहलवानों की कुश्ती का आनंद उठाते थे ।लेकिन धीरे-धीरे पश्चिमी सभ्यता के असर और लोगों की जिंदगी की व्यस्तता ने इन सारी पुरातन सभ्यताओं एवम संस्कृतियों को पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया है और लोक कलाएं अब मिटने की कगार पर दिख रही है ।हालांकि अभी भी क्षेत्र में तमाम ऐसे माटी से जुड़े कलाकार हैं जो गाव की संस्कृत को बचाने की लगातार जद्दोजहद कर रहे हैं लेकिन लगातार बदलते हुए परिवेश में और जिंदगी की चकाचौंध ने लोक कलाओं एवं प्राचीन लोक पद्धतियों को खतरे में डाल दिया है। गांव गांव में सावन के महीने में पड़ने वाले झूले का आनंद एवं एक सुर में एक समूह में साथ बैठकर कजरी जैसे गीतों को गाने वाले महिलाओं की आवाज भी अब सुनाई नहीं पड़ती।

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