
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र बेच रहे सब्जी
( अनुराग शुक्ला / रमेश तिवारी )
प्रयागराज ( अनुराग दर्शन समाचार )। जब से देश मे कोरोना महामारी का प्रकोप शुरू हुआ है तभी से इस बीमारी ने आम आदमी की जिंदगी की रफ्तार को कम कर दिया है ।न तो जिंदगी में पहले जैसे भाग दौड़ रह गयी और न ही पहले की तरह से आपा धापी दिख रही है । बीते लगभग 4 महीने से रोजगार धंधा के बंद होने की वजह से लोगों को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है लेकिन उसके बावजूद भी बीमारी का खौफनाक मंजर देख कर लोग ज्यादातर समय घरों में ही रहकर बिताने की जुगत में लगे हुए हैं ।स्कूलों के बंद होने की वजह से जहां एक तरफ सरकारी अध्यापक प्रति महीने वेतन प्राप्त कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ स्कूलों की बंद होने की वजह से वित्तविहीन एवं निजी विद्यालयों के शिक्षक एवं प्रबंध तंत्र के सामने भुखमरी एवं रोजी-रोटी की समस्या विकराल रूप की तरह खड़ी है ।इसी तरह से तमाम ऐसे लोग हैं जो परदेस जाकर नौकरी करके अपने घर परिवार का भरण पोषण करते थे लेकिन महामारी की शुरुआत होने के बाद ही सभी लोग वापस अपने घरों में आ गए हैं और जहां पर भी किसी तरह का कोई रोजगार का साधन न होने की वजह से ऐसे लोगों के सामने भी समस्याएं सुरसा की तरह मुंह फैलाए खड़ी है। ऐसे में भारी संख्या में ऐसा तबका भी है जिसके सामने इस बीमारी के चलते जिंदगी के मायने बदले बदले से दिख रहे हैं और लोग केवल इसी बात का इंतजार लगातार कर रहे हैं कि कब इस महामारी से देश को निजात मिले और सभी लोग पहले की तरह अपने अपने कारोबार में लग जाए। हालांकि सरकारी तौर पर भले ही श्रमिकों को लेकर योजनाओं का संचालन किया गया हो लेकिन इसकी जमीनी हकीकत कागजी आंकड़ों से बहुत अलग है ।तमाम ऐसे युवक जो कहीं बाहर रहकर पढ़ाई लिखाई किया करते थे महामारी के चक्कर में वहां से वापस घर आ गए स्कूल कॉलेज बंद होने की वजह से पढ़ाई तो बंद हो गई लेकिन आर्थिक तंगी के चलते सड़कों पर या तो ठेला लगाकर परिवार के भरण-पोषण में लगे हैं या सड़कों की पटरी पर सब्जी की दुकान लगाकर अपना काम चला रहे हैं। जिस तरह का उल्लास जिंदगी में रहा करता था वह पूरी तरह से गायब दिख रहा है कुल मिलाकर महामारी ने जिंदगी की रफ्तार को एकदम कम करते हुए पूरा मायने ही बदल कर रख दिया है।