
( अनुराग शुक्ला )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। माघ मेला क्षेत्र के त्रिवेणी मार्ग पर स्थित श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने माघ मेला प्रवचन के क्रम में आज कहा कि ज्ञान स्वयंप्रकाश है ।
यह कर्ता, करण, क्रिया एवम् फल के अधीन नहीं है ।कर्ता करोड़ प्रयत्न करके भी स्थाणु-ज्ञान को पुरुष ज्ञान नहीं बना सकता ।
केवल मान्यता कर्ता के अधीन होती है ।
वह अपनी मानी हुई वस्तु को गणेश माने, सूर्य माने, बाद में हेरफेर कर दे, या बिलकुल ही छोड़ दे, इन सब बातों में स्वतंत्र होता है ।
परन्तु यह ज्ञान नहीं है, यह तो कर्ता की कृति है, जिसको वह स्वयम् गढ़ता है और बाद में स्वतंत्र मान लेता है ।
ये मान्यतायें प्रत्येक कर्ता की, सम्प्रदाय की, जाति की और राष्ट्र की अलग-अलग हो सकती हैं और होती हैं ।
परन्तु ज्ञान सबका एक होता है।
स्थाणु को भिन्न-भिन्न मनुष्य चोर, सिपाही अथवा भूत के रूप में मान सकते हैं ।
परन्तु ज्ञान सबका एक ही होगा, कि यह स्थाणु है ।
पुरुष भेद से ज्ञान में भेद नहीं हो सकता ।
क्योंकि किसी भी पुरुष के द्वारा अथवा पुरुषविशेष के द्वारा ज्ञान का निर्माण अथवा रचना नहीं होती ।यहाँ तक कि ईश्वर भी ज्ञान का कर्ता नहीं होता ।वह तो स्वयम् ज्ञानस्वरूप है । पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के निजी सचिव स्वामी बृज भूषण दास जी महाराज एवम् दिनेश मिश्र ने भी पण्डाल में उपस्थित सनातन धर्मावलम्बियों, श्रद्धालुओं को प्रवचन के द्वारा अपना मार्गदर्शन प्रदान किया ।