ज्ञान, भक्ति और अपने सम्पूर्ण कर्मों में भगवान की शरणागति का भाव–यही उपनिषदों का मथितार्थ है – शंकराचार्य नरेंद्रानंद

( अनुराग शुक्ला )प्रयागराज अनुराग दर्शन समाचार मांग मेला त्रिवेणी मार्ग पर स्थित सुमेरु पीठ काशी के शिविर में प्रवचन के क्रम में आज श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर यति सम्राट अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि उपनिषद् के सार तत्व को वेदान्त कहते हैं | ज्ञान, भक्ति और अपने सम्पूर्ण कर्मों में श्री भगवान की शरणागति का भाव–यही उपनिषदों का मथितार्थ है | ज्ञान का अर्थ प्रचुर अध्ययन से होने वाला गम्भीर आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभव तथा गुरुजनों के उपदेश एवम् आचरण पर ध्यान देने से प्राप्त होने वाली सम्यक दृष्टि है | सत् क्या है और असत् क्या है ? महान क्या है और क्षुद्र क्या है ? हमें क्या स्मरण रखना चाहिए और क्या भूल जाना चाहिए–इस बात को जानना आवश्यक है | इसी का नाम ज्ञान है और यह ज्ञान हमारी समस्त क्रियाओं का सूत्रधार होना चाहिए | पूज्य शंकराचार्य भगवान ने कहा कि इससे कर्म में अनासक्ति का भाव आता है | हम कर्तव्य से मुँह न मोड़ें, अपितु समस्त प्राप्त कर्म अनासक्त होकर तथा इस बात पर दृष्टि रखते हुए कि, किस बात में जगत का हित है और किसमें जगत का अहित है–करते रहें |हमारी क्रिया स्वार्थ के लिए–अपने लाभ के लिए न हो | पूज्य शंकराचार्य भगवान से पूर्व मंच पर विराजमान पं० दिनेश द्विवेदी जी, पं० राम सूरत रामायणी जी, स्वामी बृज भूषण दास जी महाराज ने भी अपने प्रवचन के माध्यम से उपस्थित सनातन धर्मावलम्बी श्रद्धालुओं को अपना मार्गदर्शन एवम् आशीर्वचन प्रदान किया |

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