
( अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। आर्य कन्या डिग्री कॉलेज, प्रयागराज में अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शासी निकाय के
अध्यक्ष पंकज जायसवाल ने करते हुए सभी को अपना आशीर्वाद प्रदान किया । मुख्य वक्ता के रूप में प्रो0 संजय, डीन समाज कार्य विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी ने ‘रोल ऑफ मेन इन स्टॉपिंग जेन्डर बेस्ड वायलेन्स’ पर
विस्तार पूर्वक प्रत्येक पहलुओं का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक शांति देखनी है तो सभी को मां के समान बनना होगा। महिलाये प्रत्येक उत्तरदायित्वों का
निर्वहन कर रही है। आवश्यकता है पुरूषों के मानसिक बदलाव की, सर ने कहा कि स्त्रियां 14-16 घंटे कार्य करती है उनके कार्यों में पुरुषों की सहभागिता होनी चाहिए। औरते पैदा नही होती उन्हे बनाया जाता है उसी तरह पुरुषों को भी बनाया
जाना चाहिए कि वो इस समाज मे महिला-पुरूष को समान देख सके। प्राचार्या डॉ0 रमा सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि महिलाएं ही महिलाओ
को आगे बढ़ते हुए नही देखना चाहती। महिला आज शक्ति के रूप में उभर रही है । जो समाज मे बराबरी का दर्जा हासिल कर विश्व की प्रगति में शाधक की भूमिका मे है उसके प्रति समाज को नजरिया बदलना होगा। कार्यक्रम का संयोजन एवं
संचालन डॉ0 ज्योति रानी जायसवाल ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ0 नीलांजना जैन
ने किया। कार्यक्रम में डॉ0 ममता गुप्ता, डॉ0 कल्पना वर्मा, डॉ0 इभा सिरोठिया, डॉo
मुदिता, डॉ0 पुष्पलता सहित आदि शिक्षक, शिक्षिकाएं एवं छात्राएं उपस्थित रही।
दूसरे सत्र में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस साप्ताहिक कार्यक्रम के अर्न्तगत इलाहाबाद विश्वविद्यालय सांस्कृतिक केन्द्रीय समिति के सदस्यों के द्वारा ‘साहित्य में
नारी’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन हुआ जिसमें मुख्य वक्ता हिन्दी विभाग से
प्रो0 आशुतोष पार्थेश्वर, प्रो० संतोष भदौरिया व अधिवक्ता श्रीमती रचना दुबे, कु0
श्रेया थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहें शासी निकाय के अध्यक्ष, श्री पंकज जायसवाल जी ने कहा कि साहित्य में महिलाओं के भीतर बढ़ती जागरूकता ने
उनकी पारम्परिक छवि को तोड़ा है। पहले की स्थिति कुछ भी रही हो आज स्त्री साहित्य से लेकर विज्ञान तक हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है। मुख्य वक्ता, डॉ0 आशुतोष पार्थेश्वर, एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने
अपने वक्तव्य में प्रेमचन्द और रेणु के हवाले से बताया कि पुरूषों का नवशिक्षित वर्ग हर युग में स्त्रियों की दशा में सुधार तो चाहता है पर विकास सीमाबद्ध तरीके से
चलता है। इनके लेखन में स्त्री पात्र पुरूषों का प्रशिक्षण करने वाले चरित्र है। श्रीमती रचना दुबे, एडवोकेट, इलाहाबाद हाईकोर्ट एवं एडिशनल स्टैंडिंग की सदस्य
ने महिला को अबला नहीं माना। स्त्री एक साथ कई मोर्चे पर काम कर सकती है, यह उसकी विशेषता है। प्रो0 सन्तोष भदौरिया, अध्यक्ष, कल्चरल कमेंटी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने उद्बोधन में बताया कि साहित्य के किसी भी पाठ में जब
हम प्रवेश करते है तो यह सहृदय पाठक पर निर्भर करता है कि वह कितना पुरूष है और कितना स्त्री। पितृ सत्तात्मक समाज में स्त्री की जो तकलीफें है उनको हमे देखने की आवश्यकता है। कु0 श्रेया ने महिलाओं की निर्भरता की प्रवृत्ति को तोडने
का आह्वान किया। अतिथियों का स्वागत डॉ0 ममता गुप्ता ने किया। डॉ० रमा सिंह
आर्य कन्या डिग्री कॉलेज में अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि आज महिला सशक्त है ।लेकिन आवश्यकता है कि उसे पूरा अवसर मिले नारी पुरूष लेखन मे समान अवसर मिले। कार्यक्रम का संचालन डॉ० कल्पना वर्मा ने किया तथा आभार ज्ञापन डॉ० अर्चना सिंह ने किया। इस अवसर पर सभी शिक्षक, शिक्षिकाएं एवं छात्राएं उपस्थित रहीं।