आज मनाई जाएगी शब-ए-बरात, मस्जिद और कब्रिस्तानों में रहेगी रौनक

(तलग महमूद/ अनुराग शुक्ला) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। मुस्लिम समुदाय के लिए शब-ए-बरात एक खास पर्व है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार शब-ए-बरात का त्योहार शाबान महीने की 14वीं तारीख और 15वीं तारीख को मनाया जाता है। इस मौके पर मुस्लिम लोग अल्लाह की इबादत करते हैं।

इसाले सवाब के लिए बारगाहे ईलाही में की जाएंगी दुआएं

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार शब-ए-बरात में इबादत करने वाले लोगों के सारे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। इसलिए लोग शब-ए-बरात में अल्लाह की इबादत करते हैं। इसी उम्मीद से लोग खुद के लिए और अपने पूर्वजों के लिए गुनाहों को माफ करने की दुआ मांगते हैं। शब-ए-बरात का त्योहार रविवार को मनाया जाएगा।

मुकद्दस रातों में से एक है शब-ए-कद्र की रात

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, शब-ए-बरात की रात हर साल में एक बार शाबान महीने की 14 तारीख को सूरज ढलने के बाद शुरू होती है। शब-ए-बरात का अर्थ है शब यानी रात और बरात यानी बरी होना है। यही वजह है कि मुस्लिम शब-ए-बरात को रात भर तिलावत और दरगाहों की ज़ियारत करते हैं। जैसे कि मान्यता है शब-ए-बरात सिर्फ गुनाहों की माफ़ी और मरहूमों के लिए दुआओं की रात नहीं है, बल्कि कौन पैदा होगा, किसकी इस दुनिया से रुखसत होगा। किसे कितनी रोजी मिलेगी। किसके गुनाह बख्श दिए जाएंगे। यानी हर मुसलमान की तक़दीर इस रात तय की जाएगी, ऐसा माना जाता है। उलमा बताते हैं कि सिर्फ गुनाह ही माफ़ नहीं किए जाएंगे, बल्कि अल्लाह द्वारा अपने हर बंदे के लिए साल भर में होने वाले काम बांट दिए जाएंगे। पूरे साल का अमाल हिसाब भी अल्लाह द्वारा इस रात को किया जाएगा। जो दुनिया से जा चुके हैं। उनके लिए भी दुआएं मांगी जाती हैं। अपने के लिए माफ़ी मांगते हैं और खुद को भी जन्नत नसीब हो, इसके लिए अल्लाह से दरख्वास्त करते हैं। इसीलिए कब्रिस्तान जाकर अपने पूर्वजों की कब्र से रोशनी करते हैं। फूल मालाएं चढ़ाते हैं। पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब ने इसे रहमत की रात कहा है। इस मौके पर सभी मुस्लिम लोग मस्जिद और कब्रिस्तानों में जाकर अपने और पूर्वजों के लिए खुदा से इबादत करते हैं। तो बहुत सारे लोग अपने घरों में रहकर ही अपने परिवार के साथ अल्लाह की इबादत करते हैं और अपने गुनाहों से माफी मांगते हैं। दुआ करते हैं कि ऐ अल्लाह हमें नेकी और सही रास्ते पर चला। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार इस्लाम में चार मुकद्दस (पाक) मानी गई हैं। (जिसमें पहली आशूरा की रात, दूसरी शब-ए-मेराज, तीसरी शब-ए-बरात और चौथी शब-ए-कद्र होती है।)
शब-ए-बरात की रात को उन रातो में से एक माना जाता है।

परंपरागत तरीके से मनाई जाति है रहमत की रात

घरों में पकवान जैसे हलवा, बिरयानी, कोरमा आदि बनाया जाता है। इस दिन इसाले सवाब की नियत से गरीबों में को भी खाना खिलाया जाता है। शब-ए-बरात में मस्जिदों और कब्रिस्तानों में खास तरह की सजावट की जाती है। घरों को भी रोशन करते हैं। वहीं दूसरी ओर कब्रों के आस-पास चिराग जलाकर उनके लिए दुआ-ए मगफिरत की जाती हैं।

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