सनातन परंपरा काअद्वितीय त्योहार के रूप में मनाया जाता है कुम्भ महापर्व – स्वामी महेशाश्रम 

हरिद्वार (अनुराग दर्शन समाचार )। अखिल भारतीय दण्डी संन्यासी परिषद् के राष्ट्रीय संरक्षक श्री मद् जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी महाराज ने बताया अनादि काल में समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कलश को लेकर देवताओं और दैत्यों ने आपसी युद्ध किया जो चार स्थलों पर अमृत के अंश गिरने के कारण यह चारों स्थल अमृतद्रौ के नाम से जाने गए नाशिक, उज्जैन, प्रयागराज, एवं मायापुरी के नाम से जाने जानेवाला हरिद्वार आदिक तिर्थो में कुम्भ लगते आ रहा है । सर्व प्रथम ॠषियों एवं देवताओं के द्वारा कुम्भ दर्शन एवं स्नान की परम्परा प्रारंभ हुआ। जिस परम्परा को निर्वाहन करते हुए सनातनी राजाओं ने निर्वाहन किया परन्तु बौद्ध काल आने के बाद सभी राजा बौद्ध मत अवलम्बी होकर कुम्भ परम्पराओं का त्याग कर दिया उसी समय आद्य गुरु शंकराचार्य का पादुर्भाव हुआ । उन्होंने बौद्ध मत अवलम्बिओं को प्रास्त कर सनातन धर्म की स्थापना की और सनातन धर्म के रक्षा के लिए दशनाम संन्यासी परम्परा का स्थापना किया और इन्ही संन्यासियों के द्वारा प्रत्येक त्यौहार मठ मन्दिर एवं कुम्भ आदिक परम्पराओं का निर्वाहन का आदेश दिया तभी से शंकराचार्य एवं दण्डधारी संन्यासी एवं आखाडा नाम से जाने जानेवाले सभी दिगम्बर संन्यासी के द्वारा कुम्भ परम्परा का निर्वाह शाही स्नान आदिक परम्पराओं से कुम्भ पर्व का निर्वाहन करते आ रहें हैं।
अध्यक्ष स्वामी ब्रह्माश्रम जी महाराज महामंत्री स्वामी शंकराश्रम जी महाराज अखिल भारतीय दण्डी संन्यासी परिषद् के सभी साधु संत मौजूद थे।

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