
( अनुराग शुक्ला )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। माहे मुक़द्दस रमज़ान मे जहाँ रोज़ादारों को अल्लाह नमाज़ी व परेहज़गार बना देता हैं वहीं तरहा तरहा की नेमतों से भी नवाज़ देता है।पुरे साल एक वक़्त मे इतने सारे लवाज़मात नसीब नहीं होते जो माहे रमज़ान मे एक वक़्त मे खाने को नसीब होते हैं।यही वजहा है की लोगों को रोज़ा खुलवाने का जितना सवाब है उतना अकेले रोज़ा खोलने का नहीं।घरों मे दोपहर ढ़लने के साथ ही घर की औरते इफ्तारी की तय्यारी मे लग जाती हैं।सहरी खाने के बाद फजिर की नमाज़ अदा करने के उपरान्त तिलावते कलाम ए पाक खत्म कर थोड़ा आराम करने के बाद महिलाएँ नमाज़ ए ज़ोहर अदा कर इफ्तारी तय्यार करने मे मशग़ूल हो जाती हैं।तरहा तरहा के पापड़,पकौड़ी,ब्रेडरोल,चना,मटर,दही बड़ा,फ्रूट चाट तो शरबत बनाने तक की ज़िम्मेदारी महिलाओं के उपर रहती है।पुशतैनी चली आ रही रवायत के मुताबिक़ आस पड़ोस की मस्जिदों व घरों मे घर के छोटे बच्चे हाँथों मे इफ्तारी की ट्रे ले कर पुराने शहर की गलियों मे दिख जायंगे।यह परम्परा आपसी भाईचारे और इन्सानियत की मिसाल भी है की शायद हमारे पड़ोसी के घर इफ्तारी का इन्तेज़ाम है या नहीं।इससे अल्लाह भी खुश.होता है और बन्दे को रुहानी खुशी भी मिलती है।