राजनीतिक हाशिए पर खड़े अजित सिंह के लिए कैराना में ‘करो या मरो’ की स्थिति

इलाहाबाद। अजीत सिंह ये पहला मौका है, जब​ चौधरी अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल लोकसभा और यूपी विधानसभा में शून्य पर आ चुकी है. खुद अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी लोकसभा चुनाव हार चुके हैं. यूपी विधानसभा में एक सीट इनके हिस्से आई थी लेकिन वह विधायक भी राज्यसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के पाले में चला गया. अब कैराना लोकसभा उपचुनाव में पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर बसपा की पूर्व सांसद तबस्सुम हसन को टिकट दिया है. वैसे तो ये चुनाव बीजेपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश में खड़े हो रहे महागठबंधन की नींव में एक और ईंट माना जा रहा है. लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के लिए ये लड़ाई इससे कहीं ज्यादा अस्तित्व बचाए रखने की है. चुनाव में हार और जीत पार्टी का भविष्य तय करेगी.

दरअसल मुजफ्फरनगर दंगे का सबसे बड़ा असर राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति पर पड़ा. इन दंगों में जाट और मुस्लिम आमने-सामने आ गए और रालोद की पुरानी जाट मुस्लिम वोटबैंक में बड़ी चोट पहुंची. नतीजा 2014 में सामने भी आया, जब आरएलडी को एक सीट नसीब न हुई. फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 300 प्रत्याशी उतारे लेकिन जीत सिर्फ एक सीट पर मिली. और छपरौली की इस सीट के विधायक भी राज्यसभा के चुनाव में क्रॉस वोटिंग के आरोप में पार्टी से निकाले जाने के बाद बीजेपी में शामिल हो गए.

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि राष्ट्रीय लोकदल के लिए इस चुनाव में विपक्षी दलों को एक सूत्र में पिरोकर रखना कड़ी चुनौती होगी. वहीं किसानों के साथ जाट, मुसलमान, दलित और पिछड़े का गठजोड़ बनाना और ध्रुवीकरण रोकना भी बड़ी चुनौती हैं.

बीएसपी प्रमुख मायावती ने फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव की तरह कैराना में कोई संदेश नहीं दिया है. उन्होंने पहले ही साफ कर दिया है कि बसपा इस चुनाव में न हिस्सा लेगी न ही किसी को समर्थन देगी. ऐसे में कैराना में दलित वोट बैंक जो संख्या के लिहाज से मुसलमानों के बाद दूसरे नंबर पर आता है, उसे हासिल करने की मुश्किल रालोद के सामने हैं.

सियासी जानकारों के अनुसार अगर तबस्सुम की हार होती है तो रालोद के लिए ​अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा, साथ ही 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन की राजनीति में भी उसकी दावेदारी पर असर होग. वहीं अगर जीत मिलती है तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में एक बार फिर रालोद की धमक सुनाई देगी.

इस पूरे मामले में राष्ट्रीय लोकदल के प्रवक्ता अनिल दुबे कहते हैं कि चुनाव को लेकर हम पूरी तरह से तैयार हैं. आज तबस्सुम हसन नामांकन कर रही हैं. आज ही कार्यकर्ताओं की सभा हो रही है, जिसे जयंत चौधरी संबोधित करेंगे. हमने विधानसभा से लेकर ब्लॉक लेवल पर प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं. पोलिंग स्तर पर प्रभारी तैनात हो चुके हैं. ये सभी गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले जाकर बीजेपी सरकार की पोल खोलेंगे. हम बेनकाब करेंगे कि जो किसानों और नौजवानों के लिए घोषणाएं की गई थीं, उन्हें पूरा नहीं किया गया है. आरएलडी के नेता इस पर सरकार को बेनकाब करेगे.

आरएलडी के लिए ये चुनाव कितना अहम है? इस सवाल पर अनिल दुबे कहते हैं कि बेशक ये चुनाव राष्ट्रीय लोकदल के लिए बेहद अहम है, हम पार्टी सिंबल पर मैदान में उतरे हैं. लेकिन साथ ही ये चुनाव देश के लिए भी अहम है. यह चुनाव 2019 के लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेगा.

वहीं जाट और मुस्लिम वोट की पुरानी राजनीति पर लौटने के सवाल पर अनिल दुबे ने कहा कि सभी एक साथ मिलकर इस चुनाव में काम कर रहे हैं और बीजेपी को बाहर करने की तैयारी है. उन्होंने कहा कि अर्से से कैराना में विकास नाम की कोई चीज नहीं रही. यहां बीजेपी का पलायन का नारा फुस्स हो चुका है. यहां लोग पेट्रोल भरवाने हरियाणा जाते हैं, नौकरी करने चंडीगढ़ जाते हैं. अब यहां की जनता जातिवाद नहीं सिर्फ और सिर्फ विकास चाहता है. उसे गन्ने की पर्ची चाहिए, उसका 13 हजार करोड़ रुपए बकाया है, वह चाहिए. खेत में गन्ना न जलाना पड़े, ऐसी व्यवस्था चाहिए.

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