इलाहाबाद। इलाहाबाद के लोागों की कुर्बानी ने और आजादी की चाहत ने 1857 में 10 दिनों तक इलाहाबाद को आजाद कर दिया था लेकिन यह बात बहुत कम लोग अभी भी जानते हैं इसे इलाहाबाद के सभी लोगों को जानना चाहिए और गर्व करना चाहिए कि उनके पूर्वजों ने 1857 में इलाहाबाद को आजाद कर लिया था।
यह जंग आजादी के लिए लड़ी गयी और सबसे बड़ी बात है कि भारतीय समाज ने यह लड़ाई लड़ी और जीती। हमे गर्व है कि कुछ दिनों के लिए ही सही हम आजाद तो हो गये थे। उक्त बातें आज पहली आजादी महोत्सव की शुरूआत करते हुए एडीजी पुलिस एस एन साबत ने खुशरूबाग में कही। 10 दिवसीय इलाहाबाद की पहली आजादी महोत्सव की शुरूआत आज शहीदवाल पर चित्र प्रदर्शनी की शुरूआत करने के साथ ऐतिहासिक नीम के पेड़ से खुशरूबाग तक पैदल मार्च कर की गयी।
सिविल इवैल्यूवेशन फाउन्डेशन के तत्वावधान में आयोजित उक्त कार्यक्रम में बोलते हुए श्री साबत ने कहा कि हमें अपने पूर्वजों से सीख लेना है। उन्होने देश के लिए अपनी शहादत दी। उस समय अंग्रेजों से 40 लाख रूपया छीन लेना और अपनी सत्ता चलाना आसान नही थी। इस कार्यक्रम को और विस्तार से होना चाहिए तथा इसमें समाज के हर वर्ग के लोगों को आगे आकर अपने गौरव को याद करना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो आर पी मिश्रा पूर्व कुलपति इविवि ने कहा कि हमारी गंगा जमुनी संस्कृति रही है। जिस तरह हिन्दू मुस्लिम दोनों मिलकर 1857 में लड़े और इलाहाबाद को आजाद करा लिया यह एक मिसाल है। इस मिसाल को हमे समझना पड़ेगा इसके संदेश को हमको समझना पड़ेगा कि अगर हम मिलकर रहेगेें तो हम कोयी भीबाधा पार कर लेगें। आजादी भी हमने इसी तरह प्राप्त की। आज भी हमे मिलजुल कर देश बनाने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में विषय की जानकारी देते हुए वीरेन्द्र पाठक ने कहा कि हम इसे इलाहाबाद की पहली आजादी इसलिए कहते है कि क्योकि 7 जून से16 जून तक इलाहाबाद के निवासियों ने मौलवी लियाकत अली व रामचन्द्र की अगुवाई में आजादी कीलड़ाई लड़ी और इलाहाबाद को आजाद करा लिया। खुशरूबाग मुख्यालय बनाया गया था। आजादी को विशेष झण्डा था जिसे लेकर हिन्दू मुस्लिम दोनों चलते थे। भारतीयों ने अपना कोतवाल और मजिष्टेट नियुक्त किया। पूरी सत्ता उसी तरह संचालित हुई जैसे कोयी राजा करता है। मौलवी लियाकत अली ने सनातन धर्म का नारा दिया जिससे उनके साथ हिन्दू भी जुट गये और 40 लाख का खजाना छोड़ अंग्रेज किले में भाग गये थे। इलाहाबाद पूरी तरह अंग्रेज विहीन हो गया था और सत्ता का संचालन भारतीय कर रहे थे। कम ही सही आजादी का स्वाद चखने के लिए भारतीयों ने बड़ी कुर्बानी दी। 17 जून को क्रूर अंग्रेज कर्नल नील आधुनिक अस्त्रों के साथ यहां आता है और भीषण जंग के बाद पुनः अंग्रेजों की सत्ता काबिज होती है। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने इलाहाबाद पूरी तरह उजाड़ दिया। घरो। को जला दिया और जो मिला उसे फांसी पर चढ़ा दिया। लेकिन बड़ी कुर्बानी देने के बाद भी भारतीयों के मन से आजादी की ललक मिटी नही।
इसके पूर्व डा प्रमोद शुक्ला ने सभी का स्वागत किया तथा 10 दिवसीय महोत्सव के बारे में बताया कि इस बार अलग अलग स्थानों पर यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन अरविन्द पाण्डेय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन अनिल गुप्ता अन्नू भइया ने किया। कार्यक्रम में वक्ता और भाग लेने वालों में एस पी सिटी ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव सत्येन्द्र चोपड़ा सभासद अजय शर्मा एस पी तिवारी कमलेश पटेल अमित उपाध्याय देवराज पाठक विपुलेश त्रिपाठी पूनम मिश्रा शिवा शशिकान्त मिश्रा सुरेन्द्र मिश्रा राजेश तिवारी डा टी एन पाण्डेय दीपक शुक्ला रवि त्रिवेदी अतुल तिवारी महेश त्रिपाठी अमन श्रीवास्तव सहित सैकड़ो लोग भारत माता की अमर शहीद अमर रहो अमर रहो का नारा लगाते हुए चल रहे थे।
डा प्रमोद शुक्ला ने बताया कि 8 तारीख को शहीद वॉल पर दुर्लभ चित्र और इलाहाबाद के बारे में प्रदर्शनी आयोजित की गई है ।9 जून को मेजा में नमन क्रांतिवीरों का, कार्यक्रम आयोजित है । 10 जून को शहीद वॉल पर एक रोशनी शहीदों के नाम । 11 जून को मोतीलाल नेहरु इंजीनियरिंग कॉलेज में जरा याद करो कुर्बानी । 12 जून को इलाहाबाद स्टेट यूनिवर्सिटी में नमन क्रांतिवीरों का ।13 जून को इलाहाबाद संग्रहालय में ।14 को जून कारगिल युद्ध की शौर्य गाथा शहीद वॉल पर कारगिल विजय दिवस । 15 जून को पीवीआर और 16 जून को शहीदवाल में कार्यक्रम की समाप्ति पर राष्ट्र कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है । यह पूरा कार्यक्रम जनभागीदारी से आयोजित है। जिसकी अगुवाई प्रोफेसर आर पी मिश्रा व डॉक्टर प्रमोद शुक्ला कर रहे हैं । कार्यक्रम की परिकल्पना व संयोजक वीरेंद्र पाठक है।