
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। आज श्री पथरचट्टी रामलीला कमेटी की
‘ कथा रामराज की ‘ रामलीला का
आठवां दिन। समुद्र के दूसरे किनारे पहुंची राम की सेना – लंका पर चढ़ाई को सन्नद्ध । लेकिन , राम की सदाशयता । एक बार फिर दूत भेज कर रावण को युद्ध की विभीषिका से बचने , सीता को राम को सौंपने का संदेश भेजने का निश्चय किया ।
युवराज अंगद को शांतिदूत के रूप में लंका भेजा , रावण के
बेटे से टकराव , अंततः उसका अंत कर अंगद का रावण के दरबार में प्रवेश होना और लुभावन मंचन सब को मोह लिया।अंगद ने रावण को बालि के बेटे के रूप में अपना परिचय दे कर राम के अतुलित बल की चर्चा कर उसको सीता को ससम्मान राम को सौंपने की सलाह दी – रावण आगबबूला । उन्हें उठा कर सागर में फेंकने का आदेश दिया ।
रोष में अंगद – पैर पृथ्वी पर रख दिया , चुनौती दी ,सारे लंका के वीर हार गए , तिल भर भी पैर न हिला सके । रावण के स्वयम आने पर पांव हटा कर अंगद ने उसे राम के पैर पकड़ कर उनकी शरण में जाने को कहा । रावण सीता को राम को वापस देने पर कदापि सहमत नहीं हुआ।
कुम्भकर्ण को बहुत प्रयास कर रावण जगाता है । सारी कथा सुना कर राम को युद्ध मे परास्त कर वापस लौटाने की बात कही ।कुम्भकर्ण का सीता जैसी नारी के अपहरण जैसी बात पर रावण को फटकारना , राम की प्रशंसा , लेकिन भाई और लंका के लिए युद्ध करने को सहमत होना – लीला मोहक रूप से मंचित हुआ । युद्धक्षेत्र में विशालकाय कुम्भकर्ण का भयंकर विप्लव , वानरों का संहार करते कुम्भकर्ण ने राम की सेना में आतंक पैदा कर दिया – त्राहि त्राहि करने लगे राम के वानर सैनिक । राम को अंततः सामने आ कर कुम्भकर्ण की विनाशलीला से सभी को बचाने के लिए तीक्ष्ण ,संहारक बाणों का प्रयोग किया । पर्वत की काया वाले कुम्भकर्ण का अंत , उसके वध के बाद संसार में राम की जयजयकार हुई । इंद्रजीत मेघनाद रावण का एकमात्र सहारा बचा । जो वह स्वयम
युद्धभूमि में आया – लक्ष्मण से घोर युद्ध – वीर घाती बाण लक्ष्मण
के हृदयस्थल को लगा , लक्ष्मण
मृतप्राय हो पृथ्वी पर संज्ञाशून्य हो गिर पड़े , रामदल में हाहाकार मचा हुआ था। बेसुध लक्षमण के शरीर से लिपट कर क्रंदन करते राम – दर्शक भी विह्वल हो गये।
हनुमान किसी तरह लंका के राजवैद्य सुषेण को ले आते हैं ।
सुषेण द्रोणाचल पर्वत से संजीवनी लेन की सलाह देते है , वह भी सूर्य निकलने के पहले ।
बहुत काठी कार्य , हनुमान इस दुर्धर्ष कार्य के लिए चल पड़े ।
रास्ते में कालनेमि ने मुनिवेश में उनको रोक कर विलंब का प्रयास किया , हनुमान को उसका कपट
पता चल गया , उसका वध कर
शीघ्रता से वे द्रोणाचल के लिए आगे बढ़ गए । संजीवनी को न पहचान पाए , उस शिलाखंड को ले लंका के लिए आ रहे हनुमान को अयोध्या के आकाश पर भारत ने देखा ,कोई मायावी, अयोध्या का अनिष्ट करने वाला समझ बिना फर का बाण मार दिया , अक्ष से धरा पर गिर गए हनुमान । भरत को सारा वृत्तांत सुनाया भरत ने अपने बाण पर चढ़ा कर उन्हें लंका भेज दिया , सुषेण के प्रयास से लक्ष्मण पूर्ण स्वस्थ हो , युद्ध के लिए हुंकार भरने लगे , जय श्री राम के घोष से आकाश गूंज उठा । मेघनाद का निकुंभला देवी के मंदिर में यज्ञ ,शत्रु की पराजय , और स्वयम के विजयी होने के लिए यज्ञ ।विभीषण का यज्ञ न पूरा होने देने के लिए वानरों का वहां भेजना , यज्ञ का विध्वंस – मोहक मंचन । लक्ष्मण मेघनाद का भीषण युद्ध दोनों वीरों के अद्भुत पराक्रम , शौर्य की परीक्षा , सांस रोके युद्ध देखता देव समाज ।
मेघनाद लक्ष्मण के भीषण प्रहार से अंततः धराशायी – लक्ष्मण की जयजयकार ।पतिव्रता सुलोचना का सत्य धर्म और न्याय को सर झुका कर नमन ।और आगे ,
सीताराम चरित अति पावन
मधुर सरस अरु अति मनभावन ।
पटाक्षेप ।