वर्चुअल भक्ति पर्व समागम से जुड़े निरंकारी भक्त

निरंकारी सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने भक्ति पर्व पर दिया संदेश

ईश्वर में अनुरक्ति ही वास्तविक भक्ति है

( अनुराग शुक्ला ) मथुरा (अनुराग दर्शन समाचार ) । संत निरंकारी मिशन का हर वर्ष होने वाला भक्ति पर्व समागम इस वर्ष भी वर्चुअल रूप में हुआ, जिसका लाभ निरंकारी मिशन की वेबसाईट के माध्यम से विश्वभर के लाखों भक्तों एवं प्रभु प्रेमियों द्वारा प्राप्त किया गया। निरंकारी प्रतिनिधि किशोर स्वर्ण ने बताया कि मथुरा जोन के भी हजारों श्रद्धालुओं ने जोनल इंचार्ज एच के अरोड़ा के प्रेरित करने पर सत्संग से लाइव जुड़कर सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का आशीर्वचन प्राप्त किया। सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के उपरांत हृदय से जब भक्त और भगवान का नाता जुड़ जाता है, तभी वास्तविक रूप में भक्ति का आरंभ होता है। जहाँ भक्त और भगवान का मिलन होता है, हमें स्वयं को इसी मार्ग की ओर अग्रसर करना है। भक्ति केवल एक तरफा प्रेम नहीं यह तो ओत-प्रोत वाली अवस्था है। जहाँ भगवान अपने भक्त के प्रति अनुराग का भाव प्रकट करते हैं वहीं भक्त भी अपने हृदय में प्रेमाभक्ति का भाव रखते हैं। सत्गुरू माता जी ने कहा कि जीवन का जो सार तत्त्व है वह शाश्वत रूप में निराकार प्रभु परमात्मा है। इससे जुड़ने के उपरांत जब हम अपना जीवन इस निराकार प्रभु पर आधारित कर लेते हैं, तो फिर गलती करने की संभावनाएं कम हो जाती हैं। हमारी भक्ति का आधार यदि सत्य है तब फिर चाहे संस्कृति के रूप में हमारा झुकाव किसी भी ओर हो, हम सहजता से ही इस मार्ग की ओर अग्रसर हो सकते हैं। किसी संत की नकल करने की बजाए, जब हम पुरातन सन्तों के जीवन से प्रेरणा लेते है तब जीवन में निखार आ जाता है। सत्गुरु माता सुदीक्षा जी ने कहा कि यदि हम किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए ईश्वर की स्तुति करते हैं, तो वह भक्ति नहीं कहलाती। भक्ति तो हर पल, हर कर्म को करते हुए ईश्वर की याद में जीवन जीने का नाम है, जो एक हमारा स्वभाव बन जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भक्त जहाँ स्वयं की जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने जीवन को निखारता हैं, वहीं हर किसी के सुख-दुख में शामिल होकर यथा सम्भव उनकी सहायता करते हुए पूरे संसार के लिए खुशियों का कारण बनते है। इस वर्चुअल भक्ति पर्व समागम में देश-विदेश के अनेक वक्ताओं ने भक्ति के सम्बन्ध में अपने भावो को विचार, गीत एवं कविताओं के माध्यम द्वारा प्रकट किया।

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