
( अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। प्रत्येक व्यक्ति को अपने वरण व्यवस्था के साथ, आचरण करते हुए,भगवत भक्ति में अग्रसर होना चाहिए, माघ मेला हरिश्चंद्र मार्ग दण्डी स्वामी नगर, में श्री नागेश्वर धाम अन्नक्षेत्र पन्डाल में प्रवचन करते हुए, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी महाराज ने कहा की शास्त्र में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, की भगवान की भक्ति के लिए अपनी जाति एवं वरण व्यवस्था को छोड़ना जरुरी है, भगवान राम ने, ब्राह्मण श्रेष्ठ संन्यासी रुप गुरु वशिष्ठ को गुरु रुप में पुजते हुए अवध के महामंत्री सुमंत्र को पिता तुल्य मानकर के, सम्मान प्रदान किया वहीं, केवट कुल में जन्मे निशाद राज गुह को भी मित्र पद ह्रदय से लगाकर मित्र पद प्रदान किया,आज के समय में विशेष कर ब्राह्मण वरण के लोग अपने वास्तविक स्वरूप को भुलते जा रहें हैं, ब्राह्मणों के हरास का मुल कारण यही है इस लिए ब्राह्मणों को अपने वरण व्यवस्था के अनुसार,कुल परम्परा का पालन करते हुए शिखा सुत्र,एवं तिलक, अवश्य धारण करना चाहिए ब्राह्मण जब तक स्वयं का स्वरूप वरण नहीं करेगा,तब तक समाज में वास्तविक सम्मान मिलना असम्भव है।