
*भगवान् की उपलब्धि का एकमात्र साधन है*
भक्ति। यह भक्ति मुक्ति से भी बढ़कर है। सामान्य जन आनंदमयी मुक्ति को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं, परंतु भक्तों की दृष्टि में वह नितांत हेय तथा नगण्य वस्तु है। प्रियतम के पाद्मों की सेवा ही उसका एकमात्र लक्ष्य होता है। भगवान् मुक्ति देने के लिए उत्सुक रहते हैं, परन्तु एकांती भक्त उसे कथमपि ग्रहण नहीं करता ।
“न किंचित् साधवी धीरा भक्ता ह्येकांतिनो मय।
वांछंत्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्।।
भगवान् का भी आग्रह मुक्ति की अपेक्षा भक्ति पर ही अधिक है। माँगने पर भक्तों को वह मुक्ति तो देते हैं, परंतु भक्ति नहीं |
“भगवान् भजतां मुकुंदो
मुक्तिं ददाति कहिंचित् स्म न भक्तियोगम्।।”
तीव्र ज्ञान के बल पर मुक्ति की उपलब्धि होना एक सामान्य घटना है, परन्तु भक्ति की प्राप्ति भगवान् की केवल कृपा से ही साध्य होती है। मुक्ति की अपेक्षा भक्ति के आकर्षण का एक गोपनीय रहस्य है। ज्ञान के द्वारा उपलभ्य ब्रह्मानंद की अपेक्षा प्रेमाभक्ति का दर्जा कहीं ऊँचा है, क्योंकि ब्रह्मानन्द रस नहीं होता, किन्तु भक्ति रसात्मिका है। वासना के विनाश से उत्पन्न आनंद को भक्त तनिक भी नहीं चाहता, वह वासना के विशोधन से प्राप्त अलौकिक रसानन्द के लिए लालायित रहता है। इसीलिए मुक्ति बढ़कर भक्ति की कक्षा होती है। परन्तु यह भक्ति साधनरूपा बैधी भक्ति नहीं है, अपितु साध्यरूपा रागानुगा प्रेमाभक्ति है जिसके विषय में भागवत प्रवर प्रह्लाद का यह अनुभूत कथन है :
“न दानं न तपो नेज्या न शौचं न व्रतानि च। प्रीयतेऽमलया भक्त्या हरिरन्यद् विडंबनम।।” रागानुगा भक्ति की यह गंभीर मीमांसा भागवत धर्म की विश्व के धर्मो को महनीय देन है।