
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार ) |श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज के त्रिवेणी मार्ग स्थित माघ मेला शिविर में पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के पावन सानिध्य में पूज्य शंकराचार्य जी महायाज के कृपापात्र शिष्य यज्ञ सम्राट सार्वभौम विश्वगुरू स्वामी करुणानन्द सरस्वती जी महाराज के दिशा-निर्देश में वैदिक विद्वानों द्वारा विगत १० जनवरी से अनवरत श्री रूद्र महायज्ञ सम्पन्न किया जा रहा है, जिसका समापन माघ पूर्णिमा (१६ फरवरी) को होगा | पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि रुद्राष्टाध्यायी यजुर्वेद का अंग है, और वेदों को ही सर्वोत्तम ग्रंथ बताया गया है। वेद शिव के ही अंश है वेद: शिव: शिवो वेद:। वेद ही शिव है तथा शिव ही वेद हैं| वेद का प्रादुर्भाव शिव से ही हुआ है। भगवान शिव तथा विष्णु भी एकांश हैं, तभी दोनो को हरिहर कहा जाता है | हरि अर्थात् नारायण (विष्णु) और हर अर्थात् महादेव (शिव) | वेद और नारायण भी एक हैं, वेदो नारायण: – साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुतम्। भारतीय संस्कृति में वेदों का बहुत महत्व है, तथा इनके ही श्लोकों, सूक्तों से पूजा, यज्ञ, अभिषेक आदि किया जाता है। शिव से ही सब है, तथा सब में शिव का वास है | शिव, महादेव, हरि, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, नीलकंठ आदि सब ब्रह्म के पर्यायवाची हैं। रुद्र अर्थात् ‘रुत्’ और रुत् अर्थात् जो दु:खों को नष्ट करे, वही रुद्र है, रुतं–दु:खं, द्रावयति–नाशयति इति रुद्र:।
पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि मनुष्य का मन विषयलोलुप होकर अधोगति को प्राप्त न हो, और व्यक्ति अपनी चित्तवृत्तियों को स्वच्छ रख सके इसके निमित्त रुद्र का अनुष्ठान करना मुख्य और उत्कृष्ट साधन है। यह रुद्रानुष्ठान प्रवृत्ति मार्ग से निवृत्ति मार्ग को प्राप्त कराने में समर्थ है। इसमें ब्रह्म (शिव) के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों का वर्णन हुआ है। जहाँ लोक में इसके जप, पाठ तथा अभिषेक आदि साधनों से भगवद्भक्ति, शांति, पुत्र पौत्रादि वृद्धि, धन धान्य की सम्पन्नता और स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है; वहीं परलोक में सद्गति एवं मोक्ष भी प्राप्त होता है :-
“यश्च सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम्।
सर्वान्नात्मगुणोपेतां सुवृक्षजलशोभिताम्।।
दद्यात् कांचनसंयुक्तां भूमिं चौषधिसंयुताम्।
तस्मादप्यधिकं तस्य सकृद्रुद्रजपाद्भवेत्।।
यश्च रुद्रांजपेन्नित्यं ध्यायमानो महेश्वरम्।
स तेनैव च देहेन रुद्र: संजायते ध्रुवम्।।
-जो व्यक्ति समुद्रपर्यन्त, वन, पर्वत, जल एवं वृक्षों से युक्त तथा श्रेष्ठ गुणों से युक्त ऐसी पृथ्वी का दान करता है, जो धनधान्य, सुवर्ण और औषधियों से युक्त है, उससे भी अधिक पुण्य एक बार के रुद्री के जप एवं रुद्राभिषेक का है। इसलिये जो भगवान शिव का ध्यान करके रुद्री का पाठ करता है, वह उसी देह से निश्चित ही रुद्ररूप हो जाता है | इस अवसर पर विश्वगुरू स्वामी करुणानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि यज्ञ से ब्यक्ति के सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं | यज्ञ कलियुग का साक्षात् कल्पबृक्ष है | स्वामी बृजभूषणानन्द सरस्वती जी महाराज, स्वामी दामोदर प्रपन्नाचार्य जी महाराज, पं० दिनेश दूबे ने भी अपने विचार ब्यक्त किया | पं० प्रदीप तिवारी (आचार्य), पं० विजय शुक्ल, पं० कार्तिक जी, पं० शंकर दयाल मिश्र, पं० शिव दयाल मिश्र, पं० रोहित तिवारी, पं० शिवम् दूबे, पं० शिवम् द्विवेदी, पं० सर्वेश मिश्र, पं० सन्दीप मिश्र, पं० बृजेश उपाध्याय, पं० शेषमणि शुक्ल, पं० कृष्णा शुक्ल, पं० सुग्गू जी, पं० अनुज मिश्र, पं० सुशील उपाध्याय, पं० प्रभाकर जी, पं० मनोज पाण्डेय आदि वैदिक विद्वानों द्वारा यज्ञ को सम्पन्न किया जा रहा है |