
अंधविश्वास, पाखण्ड और व्यवस्था परिवर्तन पर आधारित नाटकों की हुई प्रस्तुतियां
बेटी, पाखण्ड व नशामुक्ति का हुआ मंचन, लोगो ने की सराहना
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। बहुजन साहित्य कला संस्कृति के साथ साथ बहुजन रंगमंच के विकास, संरक्षण सम्बर्धन और उसके पुनरस्थापत्य को समर्पित प्रबुद्ध फाउंडेशन, देवपती मेमोरियल ट्रस्ट और डा. अम्बेडकर वेलफेयर एसोसिएशन (दावा) के संयुक्त तत्वावधान में बहुजन समाज के बच्चों के सृजनात्मक, कलात्मक और व्यक्तित्व विकास के लिये पहली फरवरी से संचालित पन्द्रह दिवसीय प्रस्तुतिपरक द्वितीय शीतकालीन बहुजन बाल रंग कार्यशाला के तहत बसपा के पूर्व मण्डल सेक्टर प्रभारी उच्च न्यायालय के अधिवक्ता रामबृज गौतम के निर्देशन में पूर्व राज्यपाल डा. माता प्रसाद द्वारा लिखित नाटक “अछूत का बेटा” नागपुर महाराष्ट्र की प्रख्यात बहुजन महिला साहित्यकार डा. सुशीला टाकभौरे द्वारा लिखित नाटक “जीवन के रंग” व “चश्मा” तथा शोसल मीडिया से लिया गया नाटक “बेटी” , “पाखण्ड” और “नशा मुक्ति” जैसे आधा दर्जन से अधिक नाटकों की प्रस्तुतियां उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के प्रेक्षागृह में की गई।
एक ओर जहां नाटक अछूत का बेटा अरुणांचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डा. माता प्रसाद द्वारा लिखा गया है। यह नाटक समाज में फैले जाति-पांति व छुआछूत जैसी कुरीतियों से समाज को सच का आइना दिखाता है। नाटक में मंदिर के पुजारी बने पंडित हरिप्रसाद के पुत्र सोमेश्वर नाथ के साथ जब दुर्घटना घट जाती है तो उन्हे खून की आवश्यकता पड़ती है मगर उनके माता पिता और बहन कमला व दोस्त दिनेश सिंह का खून उनके खून से मेल नहीं खाता। नाटक में दलित वर्ग से आने वाले शिवराम का खून मेल खा जाता है जिससे सोमेश्वर नाथ की जान बच जाती है। पंडित हरिप्रसाद की पत्नी सरस्वती और पुत्री कमला को लगता है कि समाज में व्याप्त ऊंच नीच, छुआछूत समाज के लिए घातक है। सोमेश्वर ठीक हो जाने पर जातीय बंधन से मुक्त होकर अपना विवाह ईसाई लड़की मनोरमा और बहन कमला की शादी दलित वर्ग के शिवराम से करता है। यह नाटक समाज में फैली कुरीतियों से निजात पाने के लिए बेहतरीन संदेश देता है। नाटक में मुख्य भूमिका शिवराम द्वारा यह प्रस्तुत किया गया है कि समाज में एक व्यक्ति भी पढ़ लिखकर अपने पास पड़ोस के गरीब बच्चों को साक्षर बना सकता है। इस नाटक में एक मजदूर की व्यथा है जो मजदूरी करके अपने बेटे को डिप्टी कलेक्टर बनाता है तो वहीं दूसरी ओर नाटक चश्मा नागपुर महाराष्ट्र की प्रख्यात बहुजन महिला साहित्यकार डा. सुशीला टाकभौरे द्वारा लिखा गया है। हमें नाम से पता चलता है कि इस नाटक का नज़रिया व चश्में में माध्यम से कुछ अलग जरूर प्रस्तुत किया गया होगा और नाटक इस बात पर बिल्कुल खरा उतरता है। नाटक चश्मा पितृ सत्तात्मक समाज को उखाड़ फेंकने का कार्य करता है। जैसे समाज में आप किसी को किसान की कल्पना करने के लिए कह दे तो ज्यादातर लोगों के जेहन में कंधे पर हल रखे हुए, सर पर पगड़ी, आगे दो बैल का चित्र उभरकर सामने आता है मगर महिलाएं भी उनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर काम करती है। पितृ सत्तात्मक समाज में उन महिलाओं की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है। नाटक चश्मा में यही दर्शाया गया है कि महिलाएं भी पुरुष से कम कार्य नही करती है मगर समाज उन्हे तवज्जों देने से वजाय उन्हें उपेक्षित करता रहा है। नाटक में समाज को सच बतलाकर झूठ का पर्दाफाश करता है तो डॉ. सुशीला टाकभौरे द्वारा लिखित नाटक जीवन के रंग में समाज में फैले अंधविश्वास एवं पाखंडवाद से मुक्त होने का संदेश देता है। प्रस्तुत नाटक में मुख्य भूमिका में गीता जो हमेशा पाखंड व अंधविश्वासों से दूर रहती है मगर उसकी पड़ोसी सीता पाखंड व अंशविश्वास से घिरी रहती है। नाटक में सीता के मन में अनेक भ्रांतियां है। जैसे सुहागन स्त्रियों को मंगलसूत्र जरूर पहनना चाहिए, मांग में सिंदूर जरूर लगाना चाहिए, उसे सफ़ेद साड़ी नही पहननी चाहिए मगर गीता उसके आंखों से पाखंडवाद की पट्टी हटाकर सच दिखाने में सफ़ल हो जाती है और सीता अंततः पाखंड से मुक्ति पा लेती है तथा एकांकी नाटक बेटी में बहुत मार्मिक चित्रण किया गया है जो समाज गर्भ में ही बेटी को मार डालना चाहता है क्या उन्हे सिर्फ़ बेटी से परहेज़ है या मां, बहन, नानी, मौसी व बीबी आदि से भी परहेज है? अगर अन्य किसी और से परहेज़ नहीं है तो फिर बेटी से क्यू ? अगर बेटी ही नही रहेगी तो मां, बहन, बीबी आदि का होना कहां से संभव है? यदि ऐसे ही सोच के लोग समाज होते तो माता झलकारी बाई, माता सावित्री बाई, माता रमा बाई, वीरांगना उदा देवी, फातिमा शेख कौन होता है? और आज समाज कहां होता ? नाटक पाखंड से समाज का हर व्यक्ति चाहता है कि उसे सम्मान मिले मगर पाखण्ड नाटक में पंडित का किरदार एक तरफा सम्मान तो चाहता है और यादव वर्ग के दलित कहकर सम्मान देने उसे लगता है उसकी प्रतिष्ठा दांव पर लग जायेगी और नाटक मघई चमार जब पंडित जी से नल लगवाने के सुझाव मांगता है तो पंडित इधर उधर घूमाकर बता देता है कि यह अथाह जल है, ठंडी में गरम और गर्मी में ठंडा पानी देगा।मगर वास्तविक है की पंडित को स्वयं नही पता की कहां जल है कहां नही है। यह नाटक उक्त बातों को ख़ारिज करके सच दिखाने का कार्य करती है। पाखंड से मुक्त होने का पुरजोर कोशिश है। नाटक नशा मुक्ति से समाज में लगभग हर वर्ग में ऐसे व्यक्ति आपको मिल जाएंगे जिन्हें शराब की लत लग जाती है और उनकी वजह से उनकी पीढ़ी बर्बाद होने के कगार पर रहती है मगर उन्हें अच्छा बुरा कुछ दिखता ही नही। उनके घर में एक वक्त खाने तक भी अन्न नही हो पाता जिससे उनका परिवार कुपोषित हो जाता है और शिक्षा से वंचित रह जाता है।पाखंड नामक नाटक में बेटी की भूमिका गीत के माध्यम से पिता को समझाने में सफल हो जाती है।जिससे परिवार बरबाद होने से बच जाता है। प्रस्तुत नाटक ऐसे व्यक्ति को सचेत करती जिससे समाज में शराब की वजह से पतन न हो। भूमि संरक्षण अधिकारी गौरव प्रकाश, चीफ मैकेनिकल इंजीनियर सुश्री मनीषा गोयल और लोक निर्माण विभाग की सहायक अभियंता इंजी. कामिनी कौशल ने सभी बाल कलाकारों को प्रमाण पत्र देकर उनके उज्ज्वल भविष्य के साथ सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचने की कामना की। बाल कलाकारों में प्रज्ञा गौतम, समृद्धि गौतम, आँचल गौतम, रिया गौतम, एलआर हर्षिता, रिया मौर्या, प्रज्ञा रश्मि गौतम, सुषमा, करीना, शालू, पायल, प्रियांशी पाल, नीरज गौतम, राजू राव, शशि सिद्धार्थ, लोकनाथ, साहिल सिंह, हर्ष दीप, इशान्त, श्रेष्ठ, अभिषेक, अजीत, हुसैन, अभय आदि बच्चे ने अपने अभिनय के साथ न्याय किया। प्रकाश संतलाल पटेल का रहा और परिकल्पना/ निर्देशन उच्च न्यायालय के अधिवक्ता रामबृज गौतम का रहा।