माता सती का अंग गिरकर यहां हो गयी लोप

मां भगवती का पूजन पालने के स्वरूप में होती है

सोमवार व शुक्रवार के दिन मंदिर परिसर में लगता है विशाल मेला

( अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। मां गंगा-यमुना व अदृश्य सरस्वती के पावन संगम तट से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जबकि माघ मेला क्षेत्र से सटा हुआ है मां अलोपशंकरी का प्राचीन मंदिर। शहर के अलोपीबाग मोहल्ले में स्थित मां अलोपशंकरी का दरबार वर्ष पर्यंत श्रद्धालुओं से भरा रहता है। पुराणों के अनुसार माता सती का जो अंग यहां गिरा, वह लोप हो गया। इसी कारण मां का पूजन अलोपशंकरी के रूप में किया जाता है। मंदिर में मां की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि मां भगवती का पूजन पालने के स्वरूप में किया जाता है।

मां के पालने का नवरात्र में होता है भव्‍य श्रृंगार

नवरात्र में मां के पालने का नियमित श्रृंगार होता है। जनकल्याण के लिए शतचंडी यज्ञ चल रहा है। प्रतिदिन भजन-कीर्तन के जरिए मइया की महिमा का बखानी जाती है। मां के स्वरूप के अनुसार संत व पुजारी पाठ करते हैं। सोमवार व शुक्रवार के दिन मंदिर परिसर में विशाल मेला लगता है। यहां दूर-दूर से आए भक्त बच्चों का मुंडन के साथ नाक व कान छेदन कराते हैं।

नवरात्र में श्रद्धालु चढ़ाते हैं निशान

मन की मुराद पूरी करने के लिए भक्त नवरात्र में मइया को निशान चढ़ाते हैं। गाजा-बाजा के साथ निशान चढ़ाने के लिए दूर-दराज से लोग मां अलोपशंकरी के दरबार में आते हैं। मान्‍यता है कि मां के दरबार में शीश नवाने से वे प्रसन्न होती हैं और भक्त की मनौती अतिशीघ्र पूरी होती है।

सच्‍चे मन से आने वाले भक्‍त की होती है पूर्ण मनोकामना : श्रीमहंत यमुना पुरी

मां अलोपशंकरी मंदिर के प्रबंधक व श्रीमहानिर्वाणी अखाड़ा के सचिव श्रीमहंत यमुना पुरी बताते हैं कि मां कल्याणी के दरबार में सच्चे हृदय से आने वाले भक्त की हर कामना पूर्ण होती है। मां अलोपशंकरी उन्हें धन, यश-कीर्ति, पुत्र देती हैं।

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