जीव जब परमात्मा की शरण गति स्वीकार करता है तो परमात्मा बैकुंठ छोड़कर अपने भक्तों की रक्षा सुरक्षा करता-शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी

(अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। नागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी ने नवरात्रि पर भगवान राम की कथा का वर्णन करते हुए कहा, देवताओं ने दैत्यों साथ मिलकर मंदराचल पर्वत की मथेनी बनाकर बासुकी नाग की रस्सी के द्वारा समुद्र मंथन किया। जिसमें 14 रत्न प्राप्त हुए। हलाहल विष शिवजी ने पान करके देवताओं को विजय का आशीर्वाद दिया। भगवान ने स्वयं देवताओं को अमृत पिला कर मोहिनी रूप धारण किया। राहु का सर काटा ।जिसे राहु केतु नवग्रह में शामिल हो गए। नौ ग्रहों का पूजन राहु केतु के साथ किया जाता है। शंकराचार्य महेशाश्रम में गजेंद्र मोक्ष की कथा का वर्णन करते हुए कहा, जीव जब परमात्मा की शरण गति स्वीकार करता है तो परमात्मा बैकुंठ छोड़कर अपने भक्तों की रक्षा सुरक्षा करता है। सूर्यवंशी राजाओं का वर्णन करते हुए शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी ने कहा,राजा अमरीश जैसा दूसरा कोई भक्त नहीं हो सकता, दुर्वासा जैसे संत को भी राजा से क्षमा मांगनी पड़ी। अमरीश राजा भगवान के परम सेवक थे, स्वयं भगवान की सेवा करते निराहार रहकर भगवान की एकादशी का व्रत करते यह व्रत 3 दिन का होता है। 1 दिन पूर्व भोजन का त्याग करना दूसरे दिन व्रत रखना तीसरे दिन द्वादशी में इस व्रत का पारायण किया जाता है। यह व्रत करने वाले भक्त परमधाम को प्राप्त करते हैं। सूर्यवंश में अनेकों चक्रवर्ती सम्राट हुए जिन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा जी को पृथ्वी पर ले आए, जिससे आज सभी के पूर्वजों को भक्ति शक्ति मुक्ति प्राप्त होती है। उन्हीं के ही वंश में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम जी का अवतार होता है। माता इच्छा पिता की आज्ञा मानकर वैदेही के साथ संत गो भक्तों का कल्याण करने के लिए 14 वर्षों के लिए वन गए। राक्षसों का वध किया, विभीषण को राज्य देकर पुनः अपने भाई भरत को दिया हुआ वरदान पूरा करने के लिए राम राज्य की स्थापना करते हैं। शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम ने दशम स्कंध की कथा का वर्णन करते हुए भगवान श्री कृष्ण के अवतार की कथा को सुनाई जिसमें बड़ी ही सुंदर झांकी प्रस्तुत की गई।

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