
प्रयागराज। प्रभु प्रेमी संघ शिविर, प्रयागराज में जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामंडलेश्वर अनंतश्रीविभूषित पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की कथा का रसास्वादन कराते हुए कहा हैं कि वृत्तियों की असुरता ही वृत्तासुरता है।
हमारे भीतर भण्डारण जो की प्रवृत्तियाँ हैं वो अतिलोभ के कारण हैं, इसलिए महापुरुषों ने कहा कि अपरिग्रह करना सीखो। ये समान्य प्रवृत्तियाँ हैं कि लोग मेरी अधीनता स्वीकार करें। किन्तु ये समझना आवश्यक है कि जो आपके विचारों से सहमत नही हैं वो आपके शत्रु नहीं हैं।
ये षडदर्शन, अनेक मत, पन्थ, सम्प्रदाय ये भारतीय संस्कृति का औदार्य ही तो हैं। मन बुद्धि, चेतना, वृत्ति, प्राण जो सबको अपने अधीन करना चाहता है वही वृत्तासुर है। अब प्रश्न ये है कि कौन है जो उसकी वृत्तियों को बदल सकता है। इतने बड़े उद्यम के लिए तप चाहिये, आचरण की शुचिता चाहिए, अक्रोध और अलोभ चाहिए।
जो दूसरो के हित और सम्मान के लिए जिया हो वही इस श्रेष्ठ कार्य को सम्पादित कर सकता है। जब दधिचि की अस्थि प्रवाहित होने जा रही थी उस समय वृत्तासुर की मन:स्थिति बदल गयी। उसने कहा कि मैं ऐसे व्यक्तित्व के चरणों का सेवक बनने को तैयार हूं। मेरा राज्य यश वैभव सब कुछ समर्पित करने को तैयार हूं, बस मुझे दधिचि जैसा पवित्र अंतर:करण मुझे प्राप्त हो जाएं और जिसने लोकहित में अपनी अस्थियाँ दान की हों वो वही भगवान को प्रिय है। आइये एक दिन के लिए दधिचि बने, एक दिन अन्नदान, अक्षरदान, सम्मान का दान करें। हम अपनी सोच की फसल हैं। अपने अंतर:करण को आध्यात्मिक, प्राकृतिक,
नैसर्गिक बनाए।
कथा श्रवण हेतु लोकसभा की अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा महाजन जी, मीनाक्षी लेखी जी, मध्यप्रदेश के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह “राहुल”, प्रभु प्रेमी संघ शिविर की अधिशासी प्रभारी पूज्या महामंडलेश्वर स्वामी नैसर्गिका गिरि जी, महामंडलेश्वर स्वामी अपूर्वानंद जी, विवेक ठाकुर, स्वामी कैलाशानन्द गिरि, स्वामी सोमदेव गिरि, महेंद्र लाहौरिया, अलका सिंगला, सुरेंद्र सराफ, सांवरमल तुलस्यान सहित बड़ी संख्या में संतगण एवं प्रभु प्रेमीजन उपस्थित रहे।