तलवार की धार पर चलने के समान होती हैं यक्षिणी साधना-महंत बजरंग मुनि उदासीन

प्रयागराज। सुप्रसिद्ध तंत्र मर्मज्ञ महंत बजरंग मुनि उदासीन जी ने बताया कि यक्ष का शाब्दिक अर्थ होता है ‘जादू की शक्ति’। आदिकाल में प्रमुख रूप से ये रहस्यमय जातियां थीं:- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, अप्सराएं, पिशाच, किन्नर, वानर, रीझ, भल्ल, किरात, नाग आदि। ये सभी मानवों से कुछ अलग थे। इन सभी के पास रहस्यमय ताकत होती थी और ये सभी मानवों की किसी न किसी रूप में मदद करते थे। देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है।


साधारणतया 36 यक्षिणियां हैं तथा उनके वर देने के प्रकार अलग-अलग हैं। उनकी साधना के पहले तैयारी की जाती है, जो अधिक कठिन है, बजाय मसान साधना के,
36 यक्षिणियों से संबंधित साधनाएं अलग-अलग तरह से की जाती है। लेकिन उन सभी को करने से पहले कुछ सावधानियां या तैयारियां अवश्य रखनी पड़ती है, जो निश्चित तौर पर साधना से भी ज्यादा कठिन है।


अगर साधक पुण्य कर्म वाला है तो स्वप्न में स्वयं महादेव आकर यक्षिणी साधना की अनुमति देंगे, नहीं तो कोई ना कोई संकेत देकर आगे बढ़ने के लिए कहेंगे।

यक्षिणियां सकारात्मक शक्तियां हैं तो पिशाचिनियां नकारात्मक। बहुत से लोग यक्षिणियों को भी किसी भूत-प्रेतनी की तरह मानते हैं, लेकिन यह सच नहीं है।
लेकिन अगर कोई बुरा सपना आया है तो साधना नहीं की जानी चाहिए। यदि साधना कर ली गई तो या तो फल प्राप्त नहीं होगा या फिर कोई बड़ा नुकसान होगा। साधना की पूर्ण अवधि में ब्रह्मचर्य, हविष्यान्न आदि का ध्यान रखता होता है।
महंत जी ने बताया कि जब पाण्डव दूसरे वनवास के समय वन-वन भटक रहे थे तब एक यक्ष से उनकी भेंट हुई जिसने युधिष्ठिर से विख्यात ‘यक्ष प्रश्न’ किए थे। उपनिषद की एक कथा अनुसार एक यक्ष ने ही अग्नि, इंद्र, वरुण और वायु का घमंड चूर-चूर कर दिया था।।

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