देवत्व का विकास करता है माघ स्नान – स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती

प्रयागराज। माघ मकरगत रवि जब होई। तीरथ पतिहिं आव सब कोई। देव दनुज नर किन्नर श्रेणी सादर मज्जहिं सकल त्रिवेणी……तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ समस्त सनातन धर्मियों को माघ मास भर विशेषकर मुख्यपर्व मौनी अमावस्या में प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में आकर स्नान-दान की प्रेणना देती हैं। संगम के इस स्नान से स्नानार्थी में देवत्व का विकास होता है।

उक्त उद्गार ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारिकाशारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती जी महाराज ने समागत भक्तों को सम्बोधित करते हुए किए।

स्वामिश्री: ने बताया कि गंगा का स्नान सामान्य स्नान नही है। सामान्य स्नान शरीर के मैल को धोने वाला होता है परन्तु गंगा आदि पवित्र नदियों का स्नान मन के मैल को धोने के लिए होता है। इसलिए गंगास्नान करने जाने के पहले सच्चा गंगा स्नानार्थी पहले घर में एक स्नान कर लेता है। ताकि गंगा स्नान के समय जल में कोई प्रदूषण न हो।

स्वामिश्री: ने आगे बताया कि स्नान के पूर्व पवित्र जल को प्रणाम करना चाहिए और फिर हाथ में जल लेकर तीर्थ स्नान का संकल्प करना चाहिए। संकल्प में पापक्षय और पुण्यफल की प्राप्ति के लिए स्नान कर रहा हूँ। यह भाव सन्निहित होना चाहिए।

स्नान के समय शरीर के मैल को धोना, तैरना आदि वर्जित हैं। जैसे मूसल को पानी में डुबोकर निकाल लिया जाता है वैसे ही डुबकी लगाकर निकल आना चाहिए। इसे शास्त्रों में मूसल स्नान कहा गया है।

स्वामिश्री: ने उपस्थित जनसमुदाय से अपील की कि वे केवल वहीं एकत्र न हों जहाँ गंगा जमुना की धाराएँ एक दूसरे से मिलती हैं। क्योंकि वहाँ खड़े होकर जहाँ तक गंगा यमुना और गंगा यमुना का संगमित जल दिखाई देता है वहाँ तक सब संगम ही माना जाता है जिसे शास्त्रों की भाषा में षट्कूल कहा गया है। इसलिए उतने दूरी में कहीं भी नहाने से संगम स्नान ही माना जाता है।

स्वामिश्री: ने इस अवसर पर मौन रहने, तिलदान, स्नान आदि का बहुत महत्व है, ऐसा बताया। गंगा की प्रदूषण से मुक्ति का संकल्प भी यदि लिया जाए तो स्नान का पुण्य अनन्त गुणा बढ़ जाता है।

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