जीव के जन्म के साथ सुख-दुख दोनों उसके के साथ बराबर साथ रहते हैं-शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम

प्रयागराज। जब मनुष्य की प्रवृत्ति संसार के प्रति आशक्त होती है तो दुख की उत्पत्ति होती हैं । जब वही मनुष्य विरक्ति मार्ग पर चलते हुए परमात्मा से संबन्ध जोडता हैं तो उसे सुख की उत्पत्ति होती है । श्री नागेश्वर धाम अन्नक्षेत्र सेक्टर 5 में
प्रवचन करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी महाराज जी ने उक्त बातें कहीं।

उन्होंने कहा कि जैसे ध्रुव राज से निकाली हुई माता सुनिती के साथ दास दासियों के निवास पर रहते थे संसार के पिता के गोद के लिए तडपते हुए व्यथित हो रहे थे तो देवर्षि नारद जैसे संत के कृपा से परमात्मा की प्राप्ति हुई । ध्रुव और राजा जनक दोनों विरक्ति के द्वारा ही भगवान के कृपा के अधिकारी बने इस लिए प्रतेक प्राणी को अपने जीवन को धर्म मार्ग पर चलाने का प्रयत्न करना चाहिए।

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