आदि गुरू शंकराचार्य जी के विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित-नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी

वाराणसी (अनुराग शुक्ल )। श्री आदि शंकराचार्य भगवान के २५२७ वें प्राकट्य दिवस (बैशाख शुक्ल पंचमी) के पावन अवसर पर आज श्री काशी सुमेरु पीठ डुमराँव बाग कालोनी अस्सी, वाराणसी स्थित मठ में भगवान श्री आदि शंकराचार्य जी का पूरे विधि-विधान से पूजन किया गया |


तत्पश्चात् उपस्थित दण्डी सन्यासियों व सनातन धर्मावलंबियों को सम्बोधित करते हुए श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर यति सम्राट अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि आदि गुरू शंकराचार्य जी भगवान के विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं |

जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की।

उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया| और भारत में भिन्न-भिन्न स्थानों पर सात मठों की स्थापना की।
आदि गुरू शंकराचार्य भगवान ने कलियुग के प्रथम चरण में विलुप्त तथा विकृत वैदिक ज्ञानविज्ञान को उद्भासित और विशुद्ध कर वैदिक वाङ्मय को दार्शनिक, व्यावहारिक, वैज्ञानिक धरातल पर समृद्ध करने वाले एवं राजर्षि सुधन्वा को सार्वभौम सम्राट ख्यापित करने वाले नित्य तथा नैमित्तिक युग्मावतार श्रीशिवस्वरुप भगवत्पाद शंकराचार्य की अमोघदृष्टि तथा अद्भुत कृति सर्वथा स्तुत्य है।


सतयुग की अपेक्षा त्रेता में, त्रेता की अपेक्षा द्वापर में तथा द्वापर की अपेक्षा कलि में मनुष्यों की प्रज्ञाशक्ति तथा प्राणशक्ति एवं धर्म औेर आध्यात्म का ह्रास सुनिश्चित है। यही कारण है कि कृतयुग में शिवावतार भगवान दक्षिणामूर्ति ने केवल मौन व्याख्यान से शिष्यों के संशयों का निवारण किय‍ा। त्रेता में ब्रह्मा, विष्णु औऱ शिव अवतार भगवान दत्तात्रेय ने सूत्रात्मक वाक्यों के द्वारा अनुगतों का उद्धार किया।

द्वापर में नारायणावतार भगवान कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने वेदों का विभाग कर महाभारत तथा पुराणादि की एवं ब्रह्मसूत्रों की संरचनाकर एवं शुक लोमहर्षणादि कथाव्यासों को प्रशिक्षितकर धर्म तथा आध्यात्म को उज्जीवित रखा। कलियुग में भगवत्पाद श्रीमद् शंकराचार्य ने भाष्य , प्रकरण तथा स्तोत्रग्रन्थों की संरचना कर , विधर्मियों-पन्थायियों एवं मीमांसकादि से शास्त्रार्थ , परकायप्रवेशकर , नारदकुण्ड से अर्चाविग्रह श्री बदरीनाथ एवं भूगर्भ से अर्चाविग्रह श्रीजगन्नाथ दारुब्रह्म को प्रकटकर तथा प्रस्थापित कर , सुधन्वा सार्वभौम को राजसिंहासन समर्पित कर एवं अहर्निश अथक परिश्रम के द्वारा धर्म और आध्यात्म को उज्जीवित तथा प्रतिष्ठित किया।
पूज्य शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने दण्डी सन्यासियों से पूरे देश में भ्रमण कर सनातन धर्म का प्रचार प्रसार करने एवम् सनातन धर्मावलंबियों को एक सूत्र में पिरोकर विधर्मियों द्वारा सनातन धर्म, संस्कृति एवम् परम्परा को कमज़ोर करने के लिए चलाये जा रहे अभियानों को विफल करने का आह्वान किया |


इस अवसर पर स्वामी दुर्गेशानन्द तीर्थ, स्वामी रामदेव आश्रम, स्वामी महादेव आश्रम, स्वामी राधेश्याम आश्रम, ब्रह्मचारी शिवनन्दन द्विवेदी व श्री विनोद त्रिपाठी सहित अन्य दण्डी सन्यासी व भक्त उपस्थित रहे | कार्यक्रम के पश्चात् प्रसाद वितरण किया गया |

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