हिंदी दिवस के मौके पर पद्मश्री अशोक चक्रधर ने बांधा शमा

ई कवि सम्मेलन ने देश भर के प्रतिष्ठित कवियों ने की शिरकत वर्चुअल रूप में साझा किए,मात्र भाषा के संस्मरण।
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र प्रयागराज, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा राजभाषा हिंदी पखवाड़ा हिंदी दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय ई-हिंदी कवि सम्मेलन ‘शब्द सागर’ का आयोजन ऑनलाइन के माध्यम से किया गया, इस आयोजन में सर्वप्रथम केन्द्र निदेशक इन्द्रजीत ग्रोवर द्वारा राजाभाषा हिन्दी पर अपने विचारों को व्यक्त करते हुए आमंत्रित सभी गणमान्य कवियों का स्वागत एवं सम्मान शब्द सुमनों से किया गया। कार्यक्रम का मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के विशुद्ध गीतकार अमन अक्षर द्वारा माँ सरस्वती के श्री चरणों में समर्पित रचना से किया गया। अमन अक्षर द्वारा पढ़ी गयी कविता ‘‘तोड़कर कोई मानक नहीं आये हैं, अपने हिस्से कथानक नहीं आये हैं को दर्शकों द्वारा सराहा गया। शब्द सागर की दूसरी कड़ी के रूप में इटावा, उत्तर प्रदेश के वीर रस के नव स्तम्भ गौरव चौहान द्वारा ‘‘रगों में रक्त बन बहता, वो माँ का दूध लिखता हूँ’’ ने कवि सम्मेलन को एक नया आयाम दिया, वहीं बिहार की माटी की महक को श्रृंगार व प्रेम के रस में डुबोकर के कवियित्री अंकिता सिंह द्वारा ‘‘वफा और बेवफाई की मिसालें हैं यहीं दोनों, समंदर की कई नदियां, नदी का इक समन्दर है’’। वीरों की भूमि राजस्थान से वीर रस के स्तम्भ विनीत चौहान के द्वारा ‘‘तो समझो उस महामृत्यु को ताण्डव रथ होना है, कुरूक्षेत्र के प्रांगण को तब महासमर ढोना है’’। मुख्य के अतिथि के रूप में फरीदाबाद, हरियाणा के दीपक गुप्ता द्वारा ‘‘लाख कोशिश करता हूँ, लाखों कमाने की…’’, वहीं उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से श्रृंगार रस के अप्रतिम कवि और शब्द स्वर के धनी डॉ० विष्णु सक्सेना की रचना ‘‘बदले परिवेश में कबीरा के देश में, स्वर्णिम प्रभात करो रे, कोई तो हिन्दी की बात करो रे, ने पूरे हिन्दी जगत को एक नया व्योम दिया। हरियाणा के हास्य व्यंग्य के श्रेष्ठ एवं सुपरिचित कवि अरूण जैमिनी ने अपनी हास्य व्यंग्य की कविताओं से ‘शब्द सागर’ में हास्य रस की एक नई धारा प्रवाहित की। पूरे ‘शब्द सागर’ कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे गंगा जमुनी तहजीब के स्तम्भ एवं सबरस के धनी डॉ० श्लेष गौतम द्वारा हिन्दी की महत्ता, उसकी सौन्दर्यता, उसकी गुणवत्ता को प्रकाशित करते हुए अपने काव्य पाठ की चार पंक्तियों को प्रस्तुत किया, ‘‘भाषा की भाव भूमि है, संवाद है हिन्दी, बच्चन, निराला, पंत है, प्रसाद है, हिन्दी, स्वाधीनता का पृष्ठ है, इतिहास है हिन्दी, सीता को जैसे राम की ही आस है हिन्दी’’। देवभूमि उत्तराखण्ड की सरजमीं से गीतऋषि डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र द्वारा बहुचर्चित गीत ‘‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’’। कवि सम्मेलन का समापन कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हिन्दी मूर्धन्य विद्वान पद्मश्री प्रो० अशोक चक्रधर द्वारा राजभाषा हिन्दी के सम्बन्ध में प्रकाश डालते हुए हिन्दी पखवाड़े पर अपने विचारों को जन मानस के बीच रखते हुए अपनी काव्य रचना ‘‘गूँजे गगन में, महके पवन में, हर एक मन में, सदभावना, मौसम की राहें दिशाओं की बांहे, चाँहें तो हमसे सदभावना’’ के माध्यम से जन सामान्य को सद्भावना का संदेश देते हुए हिन्दी के प्रयोग और उसकी व्यापकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत पुनः निदेशक द्वारा सभी आमंत्रित कविगणों का सादर आभार व्यक्त किया गया।




