नहीं थम रहा गुरु चेले के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और बाघम्बरी मठ के महंत नरेंद्र गिरि और उनके चेले आनंद गिरि के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है।
आनंद गिरि ने ऑडियो जारी कर जताई फर्जी मुकदमे में फंसाने की आशंका
जैसे-जैसे समय बीत रहा है वैसे-वैसे दोनों में जुबानी जंग तेज होती जा रही है। हर दिन विवाद में नए-नए तथ्य उजागर हो रहे हैं। गुरुवार को भी आनंद गिरि ने एक ऑडियो जारी कर खुद को दुष्कर्म जैसे मामले में फर्जी फसाने और जान को खतरे की आशंका जतायी। उनके मुताबिक उनके नंबर और उनकी डीपी का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। आनंद गिरि ने यह भी कहा है कि उन्होंने पूरे मामले की जानकारी उच्चाधिकारियों को दी है। उन्होंने लोगों से भी सहयोग मांगा है। आनंद गिरि ने खुद के आस्ट्रेलिया में पकड़े जाने के पीछे भी अपने गुरु नरेंद्र गिरि व उनकी टीम का हाथ होने की बात कही है। उल्लेखनीय है कि नरेंद्र गिरि और आनंद गिरि के दशकों पुराने गुरु- चेले के संबंध में बीते दिनों ऐसी दरार पड़ी जिसकी शायद ही किसी को उम्मीद रही हो। अखाड़ा परिषद अध्यक्ष व बड़े हनुमान मंदिर के पुजारी स्वामी नरेंद्र गिरि ने आनंद गिरि पर सन्यास परंपरा का पालन न करने का आरोप लगाते हुए उन्हें निरंजनी अखाड़ा व बाघम्बरी मठ तथा बड़े हनुमान मंदिर से निष्कासित कर दिया। खुद के निष्कासन के बाद आनंद गिरि आक्रामक हो गए और नरेंद्र गिरि पर कई बड़े गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने न सिर्फ बाघम्बरी मठ की संपत्ति बेचने का आरोप नरेंद्र गिरि पर लगाया बल्कि कुछ संतों की मौत पर भी संदेह खड़ा किया और निष्पक्ष जांच की मांग की। आनंद गिरी को इन मौतों में अब हत्या का एंगल दिखने लगा है। गुरु-चेले की लड़ाई में धन संपत्ति के साथ-साथ चरित्र से जुड़े मामले भी काफी तेजी से उछले। दोनों के बीच छिड़ी जंग से दोनों को जानने वाले लोग और प्रयागवासी स्तब्ध हैं, क्योंकि अब तक लोग आनंद गिरि को महंत नरेंद्र गिरि का सबसे करीबी और उनका उत्तराधिकारी मान रहे थे। गुरु और चेले के बीच चल रही लड़ाई में यह तय कर पाना तो बिल्कुल आसान नहीं है कि दोनों में कौन सही और कौन गलत है। लेकिन इतना जरूर है की अब दोनों लोग खुद को पाकसाफ और दूसरे को महाभ्रष्ट साबित करने लिए पूरी ताकत से जुटे हैं। पूरे मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि गुरु-चेले में कोई एक इतना ही भ्रष्ट और बेईमान है जितना कि अब दोनों एक दूसरे को बता रहे हैं तो इतने दिनों तक साथ कैसे रहे? क्यों किसी ने पहले आवाज नहीं उठाई। कहीं ऐसा तो नहीं कि गुरु और चेले के बीच हितों का टकराव इस कदर बढ़ गया कि बात मरने-मारने तक पहुंच गई। जिस प्रकार दोनों लोग एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं उससे संत समाज पर भी सवाल उठने लाजिमी हैं। क्या संत परंपरा यही है कि भगवा वेशधारी, खुद को संत कहने वाले लोग धन-संपत्ति और भोग-विलास के लिए एक-दूसरे के दुश्मन बन जायें। क्या सनातन धर्म इस बात की इजाजत देता है कि संत, सन्यासी अकूत की संपत्ति अर्जित करें। संत तो वह होता है जिसकी सारी इंद्रियां शांत हों। जिसका अर्थ और काम आदि वासनाओं से कोई सरोकार ना हो। फिलहाल गुरु और चेले कि लड़ाई में तो ऐसा नहीं दिख रहा।



