गलत बयानी से मिली जमानत की पैरिटी का अधिकार नहीं

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का काम अभियुक्त और अभियोजन के अधिकारों में संतुलन बनाए रखना है। नि:संदेह अभियुक्त के अधिकार महत्वपूर्ण हैं लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अपराधी जेल में हों ताकि समाज में सही संदेश जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह ने गांजा तस्करी के आरोपी झूंसी, प्रयागराज के धीरज कुमार शुक्ल की जमानत अर्जी खारिज करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त के प्रति सहानुभूति आपराधिक न्याय तंत्र को कमजोर बना सकती है। ऐसा होने से कानून के शासन के प्रति जन विश्वास में कमी आ सकती है। मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले सामान्य मानव नहीं रह जाते इसलिए न्यायिक विवेक का इस्तेमाल न्यायिक तरीके से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सह अभियुक्त को जमानत मिलने की पैरिटी (समानता) उस दशा में दूसरे अभियुक्त को नहीं दी जा सकती, जब जमानत गलत बयानी करके हासिल की गई हो। इसी के साथ कोर्ट ने दो वाहनों से 157.570 किलो गांजा के साथ पकड़े गए याची को जमानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया है।
मामले के तथ्यों के अनुसार एसटीएफ ने स्विफ्ट डिजायर व होंडा सिटी कार से बड़ी मात्रा में अवैध गांजा के साथ इसकी तस्करी के आरोप में चार लोगों को पकड़ा और एफआईआर दर्ज कराई। याची का कहना था ऐसे ही आरोप पर सह अभियुक्त को जमानत दी गई है इसलिए उसे भी जमानत पर रिहा किया जाए। कोर्ट ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 की शर्तों की कसौटी पर खरा उतरने पर ही जमानत दी जा सकती है और कब्जे से मादक पदार्थ की बरामदगी पर उपधारणा यही होगी कि तस्करी का माल है। आरोपी के कब्जे से बरामदगी नहीं हुई, यह साबित करने का भार आरोपी पर होता है। पुलिस द्वारा दुर्भावना से फंसाने के आरोप को भी आरोपी को ही साबित करना होगा कि पुलिस ने किसी रंजिश के कारण उसे फंसाया है।
इस मामले में ग्रुप में संगठित अपराध किया गया है। अपराध का गवाह इसलिए मिलना कठिन होता है, क्योंकि अपराधियों के साथ राजनीतिक व वित्तीय संरक्षण और मसल पावर रहता है। गवाह डर के कारण सामने नहीं आते। साथ ही ऐसे अभियुक्त को जमानत मिलने के बाद यह नहीं कह सकते कि वह अपराध की पुनरावृत्ति नहीं करेगा।ऐसे में जमानत मंजूर नहीं की जा सकती।



