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जो कुछ भी होता है,सब ईश्वरीय कृपा से ही होता है, व्यक्ति तो माध्यम मात्र है-शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द

( अनुराग शुक्ला )ठाणे (अनुराग दर्शन समाचार )। सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु प्रतिनिधि मण्डल के साथ महाराष्ट्र के प्रवास पर पहुँचे श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने आज तडाली (भिवंडी) ठाणे में श्री परसुराम रामचन्द्र पाटिल द्वारा आयोजित धर्म सभा में उपस्थित सनातन धर्मावलम्बियों को अपना आशीर्वचन एवम् मार्गदर्शन प्रदान करते हुए कहा कि जिसका देह-भाव छूट जाता है, जो कर्मों के फल के सम्बन्ध में निरिच्छ रहता है, और फलों की इच्छा नहीं रखता और सदा आनन्दित रहता है, जो सन्तोष के मध्य गृह में भोजन करने बैठता है ओर आत्मबोध का चाहे कितना ही अधिक भोजन सामने क्यों न परोसा जाय, पर फिर भी जो कभी यह नहीं कहता कि ‘बस’ अब यथेष्ट हो चुका, वह आत्मानन्द का माधुर्य दिन पर दिन बढ़ती रहने वाली रुचि के साथ सेवन करता है, वह आशा को छोड़ देता है, और उसे अहंकार के साथ निछावर करके फेंक देता है | वह जो कुछ देखता, सुनता, चलता या बोलता है, वह सब और इसी प्रकार की जो दूसरी भिन्न-भिन्न क्रियाएं करता है, वे सब आपसे आप ही होती रहती हैं | यह सारा विश्व ही उसके लिए आत्मस्वरूप होता है | भला ऐसे पुरुष के लिए कौन सा कर्म कब बाधक हो सकता है ? जिस द्वैत भाव या दुजायगी के योग से मत्सर उत्पन्न होता है, वह द्वैत भाव जिस मनुष्य में रह ही नहीं जाता, उसके संबंध में यह कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि वह निर्मत्सर है, क्योंकि उसके विषय में यह बात स्वयं सिद्ध ही होती है | इसीलिए ऐसा पुरुष सब प्रकार से मुक्त ही रहता है। और इस बात में कुछ भी संदेह नहीं कि सब प्रकार के कर्म करने पर भी अकर्मा ही रहता है, वह देखने में तो गुणयुक्त जान पड़ता है, परन्तु वास्तव में निर्गुण ही रहता है।

पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी भगवान ने कहा कि जो कुछ भी होता है। सब ईश्वरीय कृपा से ही होता है, व्यक्ति तो माध्यम मात्र है । धर्म मंच पर धर्म पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी नारायणानन्द तीर्थ जी महाराज, स्वामी अरुणानन्द जी महाराज कमलेश शास्त्री जी, स्वामी अखण्डानन्द तीर्थ जी महाराज, स्वामी केदारानन्द तीर्थ जी महाराज, स्वामी बृजभूषणानन्द जी महाराज व सम्पूर्ण कार्यक्रम के सूत्रधार नामदेव जी महाराज हरड़ सहित अन्य सन्त एवम् विद्वत्जन विराजमान थे।

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