प्रतापगढ़ में सियासी धुरंधरों ने बिछाई सियासती चाल

सुबह से देर रात तक प्रत्याशियों की मैराथन दौड़ ज़ारी
(अनुराग शुक्ला )प्रतापगढ़(अनुराग दर्शन समाचार )। विधान सभा चुनाव 2022 की चुनावी सरगर्मी तेजी से बढ़ना चालू हो गई है। प्रतापगढ़ जनपद की सात विधान सभाओं का माहौल चुनावी रंगत को पा लिया है। सबसे दिलचस्प कहानी प्रतापगढ़ सदर सीट पर है। जहां से सपा और अपना दल कमेरावादी गठबंधन से पार्टी मुखिया कृष्णा पटेल लिफाफा निशान से चुनाव मैदान में हैं। सपा समर्थित होने के बावजूद कृष्णा पटेल के बाहरी होने के नाते मतदाता ऊहापोह की स्थिति में हैं। मतदाताओं का कहना है कि अधिक उम्र व बाहरी होने की स्थिति में यहां के लोगों को कोई काम पड़ने पर उनसे मिलना मुश्किल रहेगा। दूसरे, पारिवारिक झगड़े का खेल मतदाताओं के बीच खेलना यहां के लोगों को रास नहीं आ रहा है।
*देखने में आता है कि मौजूदा राजनीतिक परिवेश में पार्टियां विशेषत*
जातिगत आधार पर केन्द्रित होकर चुनाव मैदान में उतर रही हैं। ऐसे प्रत्याशियों का मानना है कि अपनी जाति विरादरी का बहुसंख्यक वोट मिल ही जायेगा और अन्य जातियों के मतदाताओं का वोट औने पौने मिल जायेगा तो चुनावी वैतरणी पार हो जायेगी। प्रतापगढ़ सदर में भाजपा प्रत्याशी राजेन्द्र मौर्य सवर्ण मतदाताओं के साथ शहरी मतदाताओं व सरकार द्वारा किए गए विकास के नाम पर वोट मांग रहे हैं।बीते विधान सभा चुनाव में कांग्रेस से युवा नेता डॉo नीरज त्रिपाठी ने 20 हजार से अधिक मत हासिल किए थे। उनका अधिकांश मत सवर्ण वोट आधारित था। एआई एमआईएम से इसरार अहमद चुनाव मैदान में हैं। 2019 के उपचुनाव में वह 22 हजार से अधिक वोट पाए थे। लोगों का कहना है कि इसरार की लड़ाई सपा वोट को खींचने का अभ्यास है। बसपा से आशुतोष त्रिपाठी की लड़ाई बेअसरदार है।भले ही बीएसपी सरकार में मंत्री रहे नकुल दूबे यहां कचेहरी में आकर वकीलों के बीच जाकर बीएसपी प्रत्याशी के लिए वोट मांगे हों और कोहड़ौर में बीएसपी प्रत्याशी त्रिपाठी के समर्थन में एक जनसभा को संबोधित करते हुए वोट करने की अपील की लेकिन यहां बीएसपी का वातावरण बन नहीं पा रहा है। सदर करीब 42 हजार कुर्मी,35 हजार ब्राह्मण,25 हजार क्षत्रिय,27 हजार मुस्लिम व करीब 20 हजार यादव एवं अन्य पिछड़ी जातियों की संख्या लगभग एक लाख है।यह बात तय है कि यहां से जो भी विधायक रहे, सदर विधानसभा का में विकास कार्य आवश्यकतानुरूप नहीं हो सका।यही कारण है कि वोटर्स ने समय समय पर नये विधायकों को चुना।वर्ष 2007 में बसपा के संजय तिवारी यहां से विधायक रहे, इसके बाद के चुनावों में कोई भी सवर्ण प्रत्याशी विधायक नहीं हो सका क्योंकि सवर्ण प्रत्याशी पसन्द नहीं आये। यहां ब्राह्मण और बनिया वोटर्स बहुतायत में हैं।अब देखना यह है कि इस बार मतदाता किसे पसन्द करते हैं।
विधान सभा कुंडा से प्रबल रूप से सशक्त प्रत्याशी रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया खुद की बनाई हुई पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके पूर्व वह 1993से लगातार 6 बार निर्दलीय रूप में विधायक बनते हुए जीत का परचम लहरा रहे हैं।वहां सपा से किसी जमाने में राजा भैया के शागिर्द रहे गुलशन यादव व भाजपा से शिव प्रकाश मिश्र सेनानी की पत्नी सिंधुजा मिश्रा चुनाव मैदान में हैं। सपा व भाजपा वहां राजा भैया को घेरने का दावा कर रही है तो राजा भैया इस बार डेढ़ लाख पार का नारा दे रहे हैं। सपा के गुलशन यादव द्वारा यादव व पिछड़ी जाति के मतदाताओं को गोलबंद कर राजा भैया को घेरने का प्रयास किया जा रहा है और जनसभाओं में सपा प्रत्याशी गुलशन यादव राजा भैया के खिलाफ बेतुके बयान देते हुए सपा को वोट देने की अपील कर रहे हैं।वहीं दूसरी ओर राजा भैया के बेंती आवास पर कुछ ही दिन पहले ब्राह्मणों का जत्था उनसे मिलकर समर्थन देने पहुंचा था तो इधर एक दिन पहले मुसलमान बिरादरियों का हुज़ूम भी इस चुनाव में जीत का भरोसा दिलाने पहुंचाजिसे राजा भैया ने अपनी खुशकिस्मती बताई।बसपा के फहीम उर्फ पप्पू की कुंडा में हवा नहीं बन रही है, बल्कि उन्हें जो भी वोट मिलेगा वह गुलशन यादव की झोली का वोट पाएंगे। कुंडा में ब्राह्मण करीब 40 हजार, क्षत्रिय 21 हजार, यादव 49 हजार, कुर्मी 40 हजार, अन्य पिछड़ी जाति करीब 85 हजार एवं 53 हजार मुसलमान हैं।फ़िलहाल कुन्डा विधानसभा में मुख्यतः चुनावी जंग जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के प्रत्याशी राजा भैया और सपा प्रत्याशी गुलशन यादव के बीच ही मानी जा रही है।
पट्टी विधान सभा सीट पर मुख्य लड़ाई भाजपा व सपा में मानी जा रही है। वहां भाजपा से कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ मोती सिंह चुनाव मैदान में हैं। विकास पुरुष के नाम से माने जाने वाले मोती सिंह छठवीं बार पट्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। स्थानीय होने के साथ परिपक्व राजनीतिक व क्षेत्र के कोने कोने से बखूबी वाकिब होने के कारण अपनी रण शैली की धार को योजनाबद्घ तरीके से वह निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं। देखा जाय तो पट्टी विधानसभा सीट पर 2002 से2012 तक बीजेपी का अभेद्य किला रहा और मोती सिंह विजयी होते रहे लेकिन 2012 के चुनाव में राम सिंह पटेल ने बीजेपी के किले में सेंध लगाते हुए मोती सिंह को 157 वोटों के मामूली अन्तर से हरा दिया था हालांकि 2017 के चुनाव में बीजेपी से मोती सिंह ने जीत दर्ज़ करा ली और योगी आदित्यनाथ की सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।जातीय गोलबंदी के चक्र के बीच उन्होंने अपने जीवन का आखिरी चुनाव होने का भावुक दांव चलकर वहां का मुकाबला दिलचस्प कर दिया है।
पट्टी विधान सभा में सबसे अधिक ब्राह्मण करीब 60 हजार, कुर्मी लगभग 56 हजार, क्षत्रिय करीब 40 हजार, यादव 35 हजार ,अन्य पिछड़ी जातियां 38 हजार, मुस्लिम वोटर 36 हजार एवं अनुसूचित जाति करीब 80 हजार हैं। इस बार भाजपा को सवर्ण वोटरों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, व्यापारी वर्ग के अधिकांश वोट एवं अनुसूचित जाति के काफी मतों के मिलने का आकलन किया जा रहा है। सपा ने इस सीट पर पिछड़ी जाति खासकर कुर्मी व यादव मतदाताओं को ध्यान में रखकर राम सिंह पटेल को तीसरी बार चुनाव मैदान में उतारा है। पट्टी की सीट पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक होंगे। बसपा से फूल चन्द्र मिश्र भी ब्राह्मण मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। यहां कांग्रेस से सुनीता सिंह पटेल चुनाव लड़ रही हैं। सुनीता पटेल तीन बार जिला पंचायत का चुनाव अपना दल से लड़ी हैं।2010 में विजई रही है। आगे दो बार के चुनाव में जबरन हरा दी गई थी। वह पिछड़े वर्ग के जातीय वोट और महिलाओं के वोट पर ज्यादा केन्द्रित हैं।अनुमान है कि यह सीट चुनावी गठजोड़ में आगे और दिलचस्प हो जायेगी।वैसे यह माना जा रहा है कि पट्टी विधानसभाई क्षेत्र में कड़ा मुकाबला भाजपा और सपा प्रत्याशियों के बीच ही है।



