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टूट गई दधिकांदो मेला की ऐतिहासिक परंपरा

टूट गई दधिकांदो मेला की ऐतिहासिक परंपरा
सुलेम सराय में इस वर्ष नहीं निकाली गईं चौकियां
मेला कमेटी के पदाधिकारियों ने की रस्म अदायगी

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार) । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के त्योहार के बाद शहर में दिखने वाली दधिकांदो मेला की रौनक इस बार गायब है। सड़कों पर रंग-बिरंगी रौशन के बीच राजसी वेशभूषा में सजे हाथी पर रखे चांदी के हौदे पर आसीन श्रीकृष्ण-बलदाऊ के दिव्य स्वरूप का दर्शन करने वाले इस बार नहीं दिखेंगे। कोरोना संक्रमण के कारण इस वर्ष दधिकांदो मेला की ऐतिहासिक परंपरा टूट गई। सुलेम सराय दाधिकादों मेला कमेटी के पदाधिकारियों ने ठाकुरद्वारा मंदिर में श्रीकृष्ण-बलदाऊ की झांकी सजाकर विधिवत पूजन कर आरती तो उतारी लेकिन न तो चौकी निकली और न ही सड़कों पर रौनक दिखी।
दधिकांदो उत्सव जन्माष्टमी के बाद श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित होता है। यह मेला धार्मिक के साथ सामाजिक एकता का प्रतीक है। महाराष्ट्र में गणेश पूजा की तर्ज पर प्रयाग में आम जनमानस को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एकजुट करने के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के बाद उनकी छठी से दधिकांदो मेला कराया जाने लगा। प्रयागराज में दधिकांदो की शुरुआत 1890 में तीर्थपुरोहित रामकैलाश पाठक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विजय चंद्र, सुमित्रा देवी द्वारा की गई। तब मशाल व लालटेन की रोशनी में श्रीकृष्ण-बलदाऊ की सवारी निकाली जाती थी। तब भगवान हाथी पर नहीं बल्कि भक्तों के कंधे पर सवार होकर निकलते थे।
सुलेम सराय दधिकादों मेला कमेटी के अध्यक्ष अतुल केसरवानी, महामंत्री धर्मेद्र द्विवेदी, कोषाध्यक्ष सचिन केसरवानी के नेतृत्व में रविवार को श्रीकृष्ण-बलदाऊ का विधि-विधान से पूजन किया गया। इसमें राजेश गुप्ता, राकेश जैन, शरद केसरवानी, मनोज गुप्त, प्रेम नारायण केसरवानी, वीरेंद्र केसरवानी, प्रदीप केसरवानी आदि मौजूद रहे।

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