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छायावादी कवियों की रचनाओं की आध्यात्मिक चेतना की जलधारा में समूचे हिन्दी साहित्य ने स्नान कर लिया

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0 प्र0, प्रयागराज एवं प्रयाग महिला विद्यापीठ डिग्री कालेज , प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में महीयसी महदेवी वर्मा पर केन्द्रित ‘छायावाद और महादेवी वर्मा’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन महादेवी सभागार  (प्रयाग महिला विद्यापीठ डिग्री कालेज, प्रयागराज) में किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ माँ सरस्वती, महीयसी महादेवी वर्मा एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोष की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रारम्भ में महाविद्यालय की छात्राओं द्वारा मचंचासीन अतिथियों  का स्वागत एवं सम्मान  पुष्प गुच्छ एवं स्मृति चिन्ह देकर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए एकेडेमी के अध्यक्ष डाॅ उदय प्रताप सिंह ने कहा कि ‘महादेवी जी की कर्मभूमि में रह कर यदि महिला सशक्तिकरण को ना समझे तो व्यर्थ है। यह शहर छायावाद का प्रकाश स्तम्भ है। छायावाद के चार स्तंभों पंत, निराला, महादेवी और प्रसाद में से तीन यही पर हुए। महादेवी की जो भाषा है और प्रसाद, पंत और निराला की भाषा है वह हिन्दी साहित्य की एक अपूर्व निधि थी। महादेवी पूरी सनातन परंपरा का लेकर अपनी कविताओं में ढाल देती है। बौद्धिक क्षमता वाली यदि कोई कवियत्री है तो वह महादेवी हैं।’  कार्यक्रम में मुख्य वक्ता प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह (हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज) ने कहा कि ‘समकालीन आलोचना काव्य केन्द्रित होने के कारण महादेवी जी के साथ न्याय नहीं कर सकी छायावाद की लघुत्रयी में भले ही महादेवी जी की गणना होती है। लेकिन उनका समग्र मूल्यांकन किया जाय तो वे समस्त छायावादी रचनाकारों में विशिष्ट हैं। महादेवी जी की गद्य रचनाएं उनकी पद्यात्मक रचनाओं की पूरक हैं। उनके द्वारा सम्पादित ‘चाँद’ को समाहित करते हुए उनके समग्र मूल्यांकन की आवश्यकता है।  संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता डाॅ. अनूप कुमार ने कहा कि ‘महादेवी की कविताओं से एक ओर प्रेरणा तो दूसरी ओर भारतीय समाज में स्त्री जीवन की वास्तविक स्थिति का बोध होता है। हिन्दी गद्य साहित्य में संस्मरण एवं रेखाचित्र को बुलंदियों तक पहुचाने का श्रेय महादेवी को है। उनके संस्मरणों और रेखाचित्रों में शोषित, पीड़ित लोगों के प्रति ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के लिये भी आत्मीयता एवं करुणा प्रकट होती  है। संगोष्ठी के सम्मानित वक्ता डाॅ. अरुण कुमार मिश्रा ने कहा कि ‘छायावाद का कैनवास बहुत व्यापक है। और महादेवी की रचनाओं का कैनवास भी बहुत व्यापक है। छायावाद के बीच निराला व पंत ने अपने विचार बदले किन्तु महादेवी जीवन पर्यन्त छायावाद में रहीं। छायावाद को रहस्यवाद से जोड़ा गया है। भारतीय नारी का जो औदात्य रूप  है उसका आगाज महादेवी जी से होता है। संगोष्ठी के सम्मानित वक्ता प्रो. रमेश चन्द्र शुक्ला ने कहा कि ‘छायावाद की आजतक कोई सम्यक परिभाषा नही दी जा सकी है। छायावादी साहित्य को पलायनवादी साहित्य कहा गया है । छायावाद अपने साथ रहस्यवाद को लेकर आया। महादेवी का महिला होना एक तरफ उनकी सार्थकता थी तो दूसरी तरफ अवरोध था।’ संगोष्ठी की सम्मानित वक्ता डाॅ. सृष्टि कुशवाहा ने कहा कि ‘पूरा का पूरा छायावाद अध्यात्म की अद्भुत छाया है। छायावादी कवियों की रचनाओं की आध्यात्मिक चेतना की जलधारा में समूचे हिन्दी साहित्य ने स्नान कर लिया और बात जब महोदेवी जी की हो तो कहना ही क्या, उनकी वाणी तो जीवन की अपार्थिव वेदना की गंगोत्री से निकली वेदना है जो अनकों भावनाओं और संवेदनाओं को अपने अंक समेटे हुए तीर्व गति से प्रवाहित होती है जिसमें साथ-साथ पाठक भी बहने लगता है।’ संगेाष्ठी का संयोजन एवं संचालन प्रयाग महिला विद्यापीठ डिग्री कालेज , प्रयागराज की कार्यवाहक प्राचार्या डाॅ. जूही शुक्ला ने किया। इस अवसर पर डाॅ. विनम्रसेन सिंह ने महादेवी जी को मूलतः गीतकार बताते हुए ‘कण-कण मे प्रेम रंग भर कर वो लाया है प्रीत का ये मौसम है, अब बसंत आया है। गीत सुनाया।  कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में डाॅ. सपना चैधरी, डाॅ. ज्योति, शाम्भवी, रवि जी, डाॅ. रमेश सिंह, डाॅ सरोज सिंह, सहित शहर के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

 

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