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खरगोश वाले बाबा महामंडलेश्वर कपिल देवदास नागा

 

शिविर में है विभिन्न प्रजाति के 30 खरगोश, बेटी राधिका वैष्णव करती है देखभाल।

( विनय मिश्रा )
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। संगम की रेती पर चित्रकूट के मां तारा आश्रम के महामंडलेश्वर कपिल देवदास नागा का शिविर माघ मेला के महावीर मार्ग पर रामानंद अ मार्ग पर लगा हुआ है। वहा जहां पर बैठते हैं। इनके आसन के चारों ओर खरगोश ही नजर आते हैं। इनकी संख्या 25 से 30 तक है।
प्रयागराज में संगम की रेती पर इन दिनों माघ मेला चल रहा है। मेले में आये साधु – संतों के कई रंग देखने को मिल रहे हैं। साधु संतों के शिविरों में हर ओर अलग ही छटा बिखरी है। कहीं लम्बी जटाओं वाले सन्यासी धूनी रमाये हुए नजर आ रहे हैं, तो भक्ति साधना में लीन संत महात्मा दिख रहे हैं। वहीं मेले में कई साधु-संत अपने खास पहनावे की वजह से चर्चा में हैं। तो कई सन्यासी अपने खास शौक के लिए मेले में लोगों के बीच सुर्खियां बटोर रहे हैं। ऐसे ही वैष्णव सम्प्रदाय के एक अनोखे संत से आज अनुराग दर्शन के पत्रकारों से मुलाकात हुई। जो संत होने के साथ ही साथ जीवों से प्रेम भी करते हैं। उन्होंने अपने आश्रम में खरगोश पाल रखा है. जिसकी वजह से लोग उन्हें खरगोश वाले बाबा के रुप में भी जानते हैं।
चित्रकूट के मां तारा आश्रम के महामंडलेश्वर कपिल देवदास नागा। यह जहां पर बैठते हैं, इनके आसन के चारों ओर खरगोश ही नजर आते हैं। बाबा को खरगोश इतने प्रिय हैं कि बाबा के साथ खरगोश खेलते रहते हैं। बाबा के मुताबिक पिछले 15 वर्षों से उनके आश्रम में खरगोश पाले जा रहे हैं लेकिन उनका यह शौक इससे भी पुराना है। इससे पहले नागा बाबा सांप और बंदर भी पाल चुके हैं। हालांकि इन खरगोशों की देखभाल महामंडलेश्वर कपिल देवदास नागा की बेटी ज्योतिषाचार्य / कथावाचिका और योगाचार्य राधिका वैष्णव ही करती हैं। संगम पर आश्रम में संत के आसन पर तमाम खरगोश खेलते दिखते हैं। ज्योतिषाचार्य एवं कथावाचिका राधिका बताती हैं कि इन खरगोशों को सब कुछ खिलाया जाता है लेकिन इन्हें फास्ट फूड मोमोज और चाउमीन खास तौर पर पसंद है. जिसके आगे आते ही ये नन्हें खरगोश चट कर जाते हैं. बाबा के आश्रम में दस वयस्क और सात बच्चे खरगोश पाले गए हैं। वहीं महामंडलेश्वर कपिल देवदास नागा के मुताबिक श्वेत रंग शान्ति व एकाग्रता का प्रतीक है और इन खरगोशों का रंग भी यही है।इसलिए इनके आस पास रहने से मन को शान्ति मिलने के साथ ही एकाग्रता आती है। जिससे साधना में कोई विघ्न बाधा नहीं आती है। बाबा के मुताबिक कथा के समय भी ये खरगोश उनके व्यास पीठ के आस-पास ही रहते हैं और भक्तों के बीच जाकर बैठ जाते है। राधिका बताती है कि यह खरगोश घास के अलावा वह सब खाते है जो आदमी खाता है। इनमें चना, चावल, सब्जी, छोला, मोमोज, दाल सहित अन्य सभी कुछ लेकिन रात में दूध और रोटी सिर्फ खाते है। इनको ठण्डक और गर्मी लगती है। इनकी उम्र तीन से चार वर्ष तक होती है। राधिका ने बताया कि इनके प्रजाति की पहचान इनके बाल से होती।

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