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भारत की छवि धूमिल करने के लिए रचा जा रहा कुचक्र – शंकराचार्य वासुदेवानंद

अपने धर्म व संस्कृति के प्रति समर्पित भाव रखना होगा। स्वामी घनश्यामाचार्य।

( अनुराग शुक्ला/आनंत पांडे )
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। भारत की छवि धूमिल करने के लिए कुचक्र रचा जा रहा है। सदियों बाद सनातन धर्म व संस्कृति का वैभव दुनिया में बढ़ रहा है। योग ध्यान संस्कृत से जुडऩे को हर देश लालायित है। लेकिन भारत विरोधी ताकतों को सनातन संस्कृति का बढ़ता प्रभाव रास नहीं आ रहा है। भारत की छवि धूमिल करने के लिए तरह-तरह का कुचक्र रचा जा रहा है। सदियों बाद सनातन धर्म व संस्कृति का वैभव पूरी दुनिया में बढ़ रहा है। योग, ध्यान, संस्कृत से जुडऩे को हर देश लालायित है। लेकिन, भारत विरोधी ताकतों को सनातन संस्कृति का बढ़ता प्रभाव रास नहीं आ रहा है। ऐसे में संतों को सक्रियता बढ़ानी होगी। उक्त बातें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य जगद्गुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कहीं। वे माघ मेला क्षेत्र स्थित जगद्गुरु घनश्यामाचार्य के शिविर में रविवार को ब्रह्मलीन गोविंद रामानुज दास गोकर्णाचार्य की स्मृति में आयोजित संत सम्मेलन को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। सामने सदैव चुनौती रही है। हर चुनौती को संतों ने अपनी तपस्या व कुशल मार्गदर्शन से दूर किया है। भविष्य में राष्ट्र के सामने जो चुनौती आएगी उसके खिलाफ भी संत समाज मुकाबला करने को तैयार हैं। स्वामी विद्याभाष्कर ने सनातन धर्म के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। कहा कि गाय, गंगा, पेड़ों की रक्षा के लिए हर व्यक्ति को योगदान देना चाहिए। संयोजक स्वामी घनश्यामाचार्य ने कहा कि हिंदुओं का हित आपसी एकता बनाए रखने पर ही है। इसके लिए अपने धर्म व संस्कृति के प्रति समर्पित भाव रखना होगा। हिंदुओं को एक करके उन्हें संस्कारित करने में संत अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। अध्यक्षता स्वामी चक्रपाणि ने की। सम्मेलन को डॉ. राघवाचार्य, स्वामी कृष्णाचार्य, हर्षचैतन्य ब्रह्मचारी आदि ने संबोधित किया।

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