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पांच माह पहले हो सकेगा मानसून का पूर्वानुमान

(विनय मिश्रा) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के सुझाव पर भारतीय मौसम विभाग अब मानसून की सेहत भांपेगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की तरफ से मिले अहम प्रोजेक्ट पर चार साल तक शोध के बाद यह सुझाव तैयार किया गया है।

इविवि के सुझाव पर काम करेगा भारतीय मौसम विभाग

चार साल शोध के बाद तैयार किया एक गणितीय मॉडल

इसके अलावा एक गणितीय मॉडल भी तैयार किया गया है। इस मॉडल से मौसम विभाग तकरीबन पांच महीने पहले मानसून का पूर्वानुमान भी बता सकेगा। यह शोध के. बनर्जी वातावरणीय एवं समुद्रीय विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. शैलेंद्र राय के निर्देशन में पूरा हुआ है।
डाक्टर शैलेंद्र ने बताया कि वर्ष 2017 में उन्हें 61 लाख का अहम प्रोजेक्ट सौंपा था, जो अब पूरा हुआ है। दक्षिण हिद महासागर का भारतीय मानसून पर प्रभाव विषयक शोध में पाया कि दक्षिणी हिंद महासागर में भी डायपोल (एक हिस्सा गर्म और एक हिस्सा ठंडा) होता है। यदि पूर्वी किनारा ज्यादा गर्म होता है तो उस वर्ष मानसून तेज रहता है। किनारा ठंडा होता है तो मानसून की बारिश जून में ज्यादा होती है। जून में होने वाली बारिश से किसानों का काफी फायदा होता है। जून में बारिश के चलते भारतीय मानसून भी प्रभावित होता है। उन्होंने गणितीय मॉडल से पूरे विश्व के डायपोल को मापने के बाद मानसून को सुधारने के लिए तीन सुझाव भी तैयार किए।
मौसम विभाग को भेजे गए सुझाव में उन्होंने बताया कि दक्षिणी हिंद महासागर में भी निरीक्षण की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। भारतीय मौसम विभाग को उन्होंने पूर्वानुमान जारी करने से पहले हिंद महासागर की गतिविधियों को भी ध्यान में रखने के सुझाव दिए हैं। डा. शैलेंद्र ने बताया कि दक्षिणी हिंद महासागर मानसून को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करता है। वह उत्तरी हिंद महासागर को प्रभावित करता है। इससे पूरे मध्य भारत का मानसून प्रभावित होता है। इसके अलावा डा. नमेंद्र कुमार शाही और निशांत मिश्र ने भी इस अहम शोध पर काम किया है। डा. निमेंद्र इस वक्त फ्रांस में विज्ञानी हैं। यह शोध एल्जेबिया के अंतरराष्ट्रीय जर्नल मैप और थ्योरेटिकल एंड एप्लाइड क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

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