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स्वस्थ रहना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती, 7 तारीख को पूरी दुनिया विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाती है।

( ज्योति श्रीवास्तव )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। 7 तारीख को पूरी दुनिया विश्व स्वास्थ्य दिवस के नाम से जानती है और स्वास्थ्य पर तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ऐसे में कलम खुद ब खुद मांग करती है कि स्वास्थ्य पर कुछ कहा जाए कुछ लिखा जाए और फिर वर्तमान समय में बीते 14 15 महीनों में तो स्वस्थ रहना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। अचानक से विश्व पटल पर एक वायरस आया और पूरी दुनिया त्राहिमाम है । भारत में स्वास्थ्य के ऊपर बात करना कोई नई बात नहीं है हमारी परंपरा और हमारी संस्कृति में ऐसे सैकड़ों मामले आते हैं जहां हम अनादि काल से स्वास्थ्य पर तरह-तरह की परिचर्चा करते आ रहे हैं फिर सर्वे भवंतू सुखिनाह सर्वे भवंतु निरामया गरुड़ पुराण का यह श्लोक पौराणिक काल से ही हमें स्वास्थ्य का महत्व समझा रहा है और आज के परिवेश में भी तमाम चिकित्सा संस्थाओं के बाहर लोगो के रूप में यही श्लोक लिखा हुआ मिलता है जिससे भारतीय संस्कृति की यह मनसा बिल्कुल स्पष्ट झलकती है कि हमारे यहां स्वास्थ्य के प्रति सजगता हमारी विरासत में है इसी बात को पौराणिक काल से जोड़ते हुए अगर हम समुद्र मंथन की ओर चलें जब भगवान धनवंतरी स्वयं अमृत कलश लेकर उपस्थित होते हैं और जग को स्वस्थ और दीर्घायु रहने का आशीर्वाद देते हैं भगवान धन्वंतरी को ही हम आयुर्वेद का जनक भी मानते हैं और तभी से आयुर्वेदिक चिकित्सा विज्ञान की नींव पड़ी हमारी हमारी संस्कृति और रीति-रिवाजों मे ऐसी उपासना पद्धति एवं पर्व त्यौहारों को विकसित किया गया है जिससे अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति संभव हो सके उदाहरण के रूप में अप्रैल के माह में ही हम शीतलाष्टमी मनाते हैं जिसमें प्रसाद के रूप में बासी भोजन का सेवन होता है और उसी दिन से इस बात के लिए हम दृढ़ प्रतिज्ञा और संकल्प लेते हैं कि आगे आने वाले सात आठ महीनों तक हम बासी भोजन नहीं खाएंगे हमारे धार्मिक अनुष्ठानों में वृक्षों की पूजा को भी विशेष महत्व दिया गया है मसलन हम पीपल वृक्ष की पूजा करते हैं बरगद के वृक्ष की पूजा करते हैं वैज्ञानिक भी इस बात को सिद्ध कर चुके हैं की पीपल का वृक्ष 24 आवर्स ऑक्सीजन का उत्पादन करता है ऐसे में उसके समीप आने पर हमें स्वतः ही शुद्ध ऑक्सीजन की प्राप्ति हो जाती है चाहे वह उपासना के जरिए ही क्यों ना हो जरूर धार्मिक ग्रंथों में एक उदाहरण और आता है कि प्रलय की समय सिर्फ बरगद वृक्ष ही शेष बचा था और उसी को ध्यान में रखकर हम बरगद की पूजा करते हैं जो छायादार वृक्षों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है तुलसी के पौधे की पूजा शमी वृक्ष की पूजा आज भी हमारे धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा हुआ है इसका एक पहलू स्वास्थ्य के लिए अवश्य ही महत्वपूर्ण है अतः जश आज हम जिस ग्रीन ग्लोबल की बात करते हैं उसकी महत्ता आदि काल में ही हमारे ऋषि-मुनियों ने समझा दी है हमारे यहां पूजा पाठ में फूल और सुगंधित चीजों का उपयोग होता है हमारे यहां स्नान को भी धर्म से जोड़ दिया गया है इसी बात को तथाकथित आयातित पाश्चात्य संस्कृति ने फ्रेगरेंस थेरेपी और सावर बाथ के नाम से स्वास्थ्य से जोड़ दिया गया है यदि हम अपनी संस्कृति को समझें उसके प्रति जागरूक बने अपने धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व समझे और इसके साथ ही योग ध्यान पद्धति से जुड़े और शाकाहार से जुड़े तो स्वस्थ रहना तत्कालीन जटिल परिस्थितियों में भी थोड़ा सहज हो सकता है एक अंग्रेजी कहावत भी है हेल्दी माइंड लीभ इन हेल्दी बाडी अतः हम परिवार एवं समाज के साथ देश को भी सही दिशा तभी दे सकते हैं जब हम स्वस्थ होगें एक अंग्रेजी कहावत भी यहां प्रासंगिक लगता है वेल्थ गान नथिंग गान हेल्थ गान समथिंग गान कैरेक्टर गान एभ्रीथिंग गान अर्थात तन और मन से स्वस्थ रहना हमारी अपरिहार्य आवश्यकता है।

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