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दलितों के टोलो से उठी हुई सिसकियां?? वैष्णो जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे!!

विंध्याचल (अनुराग दर्शन समाचार )। यह भजन बापू को बहुत प्रिय था, इसका मतलब यह है वही वैष्ण यानी हिंदू है जिसे दूसरों का दुख अपना दुख नजर आता हो, जो सभी का सम्मान करें और किसी को कष्ट न पहुंचाएं।लेकिन राजा से इन उम्मीदों के दौर में रियाया होने का अर्थ लोकतंत्र और गांधी के बीच कहां खोजें, हम कहां खोजें देश का सहारा बन गई बापू की लाठी, कहां खोजें वह चश्मा जिसके दोनों सीसे के बीच से एक नजर आता था देश, कहां खोजे उसकी आधी धोती जिसके छोर से लटक कर होता था। एहसास कभी अन्याय नहीं होने देगा यह अभिभावक! लेकिन विंध्याचल के बंगाली चौराहा पर दलितों के आशियाना को बर्बरता और बहसीयाना पंन से ध्वस्त कर दिया गया! इस दृश्य को देखकर हर एक ही आंखें नम हो रही थी! लोग बाग यही कह रहे थे, क्या अंग्रेजी हुकूमत की कहानियां पानी पानी हो जाती है इस दौर के आगे इस दस्तूर के आगे क्या इससे ज्यादा जालिम होते होंगे गोरे सिपाही क्या इससे ज्यादा जालिम रहा होगा वह जमाना! दलितों के टोलो उठी हुई सिसकियों पर एक चुनी है सरकार की तनी हुई संगीनों से ज्यादा बर्बर ज्यादा बुजदिल ख्याल और क्या हो सकता है! गरीबों को बूटो के जोर से दबाते हैं और सरयू के पानी का सौगंध उठाते हैं, जिंदा लोगों को कुचलकर मंदिर का मेहराब उठाते हैं! सिर्फ दलितों के टोलो से सिसकियां नहीं निकल रही थीं, बल्कि हर एक के जुबान से आह निकल रही थी! आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?

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