
कबीरदास के शब्दों में
बड़ी बड़ी बिल्डिंग और कारखाने लिया बनाय
हवा और पानी में जहर दिया मिलाय
अब कुदरत ब्याज समेत वसूल रही है
फिर क्यों खड़ा चिल्लाय
एक वाइरस ने दिया सिर घुमाय
बड़ी शेखी बघारी अपने ज्ञान विज्ञान की
जल्दी ढूढ़ो कोई उपाय
ये तो हुई कबीर दास की बात आज की क्षुब्ध कलम कुछ ऐसे शब्द उगलती है
ऐ धरा धीर धर जरा
क्यों है तू इतनी खफा खफा
माना कि गलती नहीं गुनाह हुआ है
पर है तो सब तेरी ही संतान
संकटों के कैक्टस और नागफनी उग आए हैं
अभी वाइरस व्यूह से
निकल नहीं पाया मानव
प्रकृति दिखा रही विनाशक दानव
अम्फन निसर्ग और भूकंप
बड़े भयानक मंजर दिखने लगे हैं
मां तेरे बच्चे डरने लगे हैं
जरा सी धूप में फैल जाता मां का आँचल
अब क्यों नहीं खिलते कोमल कमल
तेरे ओजोन आँचल में छेद हुए हैं मानव के दुष्कर्मों से
पर माँ कहाँ बदला लेती है
गुनाह सभी सदैव माफ करती है
अब अमंगल अमावस से बाहर निकालो
जल्दी भोर हो
उषा की किरण दिखा दो
ज्योति श्रीवास्तव