सीएमओ व पीएचसी अधीक्षक पर लगाया हर्जाना
आक्टा महासचिव के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द
क्वारेंटीन सेंटर की बदहाली उजागर करने का मामला
( अनुराग शुक्ला )
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। हाईकोर्ट ने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (पीएचसी) कोटवा बनी स्थित कोरेन्टीन सेंटर की बदहाली उजागर करने वाले फेसबुक पोस्ट पर ईसीसी के एसोसिएट प्रोफेसर और आक्टा (इलाहाबाद यूनिवर्सिटी कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन) महासचिव डॉ. उमेश प्रताप सिंह के खिलाफ दर्ज कराई गई प्राथमिकी रद्द कर दी है। कोर्ट ने कोटवा बनी पीएचसी के अधीक्षक डॉ. अमृत लाल यादव और प्रयागराज के सीएमओ को अपने वेतन से क्षतिपूर्ति के लिए डॉ. उमेश प्रताप सिंह को पांच हजार रुपये भी देने का आदेश दिया है।
कोर्ट फेसबुक पोस्ट पर एफआईआर दर्ज कराने के लिए सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रशासन फेसबुक पर क्वारेंटीन सेंटर की अव्यवस्था और उसकी कमियों के खिलाफ की गई टिप्पणियों के आधार पर अपनी व्यवस्था में सुधार करता या इस पोस्ट में इंगित की गई कमियों में सुधार लाता तथा अपनी व्यवस्थागत कमियों को दूर करता तो खंडपीठ इसकी प्रशंसा करती लेकिन प्रशासन ने ऐसा कुछ ना करके अपने कृत्य को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया। ऐसा लगता है जैसे राज्य का अपने अधिकारियों पर नियंत्रण खत्म हो रहा है और वे विरोध के किसी स्वर को उठने ही नहीं देना चाहते हैं।
यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज नकवी एवं न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने डॉ सिंह के अधिवक्ता अरुण कुमार त्रिपाठी व सरकारी वकील को सुनने के बाद अपने निर्णय में दिया है। कोर्ट ने कहा कि वस्तुत: सुधारवादी आवाज के प्रति असहिष्णुता प्रदर्शित करने के लिए प्रशासन दोषी है और यह न्याय के प्रशासन में एक प्रकार का हस्तक्षेप है। डॉ. उमेश प्रताप सिंह ने इविवि के पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ. बीके सिंह के कुछ शुभचिंतकों से हुई बातचीत के आधार पर कोटवा बनी क्वारेंटीन सेंटर की बदहाली को लेकर फेसबुक पर गंभीर टिप्पणी की थी। बाद में डॉ. बीके सिंह ने कहा कि वहां कोई अव्यवस्था नहीं है। उसके बाद प्रशासन की तरफ से कोटवा पीएचसी के अधीक्षक डॉ. अमृत लाल यादव ने 23 जून 2020 को डॉ. उमेश प्रताप सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 500 (2) व 500 एफआईआर दर्ज कराई और 24 जून 2020 को उसमें महामारी (संशोधन) विधेयक 2020 के सेक्शन 3(2) के अंतर्गत एक नई धारा जोड़ दी।




