फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के जरिए सगे भाइयों ने हासिल की नौकरी
कायस्थ परिवार से होने के बावजूद अनुसूचित जाति का लगाया प्रमाण पत्र
स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय का मामला, प्रधानाचार्य ने की नियुक्ति
शिकायतों के बाद भी नहीं हुई कोई कार्यवाही, लीपापोती में जुटे हैं जिम्मेदार
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से संबद्ध स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के जरिए दो सगे भाइयों द्वारा नौकरी हासिल करने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। आरोप है कि सगे भाई कायस्थ जाति के हैं लेकिन नौकरी के लिए उनके द्वारा जाति से संबंधित जो प्रमाण पत्र लगाए गए वह अनुसूचित जाति के हैं। सगे भाइयों की नियुक्ति मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य द्वारा की गई थी। जाति प्रमाण पत्रों की जालसाजी की शिकायत कई बार की गई लेकिन जिम्मेदार लोगों द्वारा किन्ही स्वार्थों के कारण न्यायसंगत कार्यवाही करने की बजाय लीपापोती की गई।
शिकायती प्रार्थना पत्रों के मुताबिक जौनपुर जिले के ग्राम लखमापुर पोस्ट मनिका कला के रहने वाले सगे भाइयों हेमंत कुमार सिन्हा तथा पवन कुमार सिन्हा पुत्रगण त्रिभुवन नाथ सिन्हा मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से संबद्ध स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय में नौकरी कर रहे हैं। हेमंत कुमार को 14 नवंबर 1994 को आरक्षित वर्ग के सफाई कर्मी और पवन कुमार को 31 अक्टूबर 1995 को वार्ड बॉय के पद पर तत्कालीन प्रधानाचार्य द्वारा नियुक्त किया गया था। आरोपों के मुताबिक कायस्थ यानी सवर्ण जाति का होने के बावजूद दोनों भाइयों ने नौकरी पाने के लिए अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र लगाया। इतना ही नहीं दोनों ने पिता के नाम में भी जालसाजी की। हेमंत कुमार सिन्हा ने हेमंत कुमार पुत्र त्रिभुवन प्रसाद और पवन कुमार सिन्हा ने पवन कुमार पुत्र टीएन लाल के नाम से नौकरी हासिल की। दोनों भाइयों ने अपना मूल पता भी छिपाया और फर्जी दस्तावेजों के जरिए खुद को 13 रीवा रोड एग्रीकल्चर थाना नैनी का निवासी बताया। कुछ समय बाद हेमंत ने सेटिंग कर स्वीपर से इलेक्ट्रीशियन के पद पर पदोन्नति पा ली। उसके पदोन्नति का मामला अदालत भी पहुंचा था। यहाँ भी अदालत के आदेश की अवहेलना का आरोप है। खुद को अनुसूचित जाति का बताने वाले पवन कुमार ने मानव संपदा में अपनी प्रविष्टियां भरते समय अपना नाम पवन कुमार टी एन सिन्हा लिखा। स्थायी पता के कालम को खाली छोड़ दिया।
*प्रमुख अधीक्षक की रिपोर्ट को किया दरकिनार*
मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से होने पर मेडिकल कॉलेज व अस्पताल प्रशासन से रिपोर्ट मांगी गई। अस्पताल के प्रमुख अधीक्षक द्वारा समय समय पर रिपोर्ट भी दी गई । जिसमें साफ तौर पर जालसाजी का उल्लेख किया गया लेकिन उनकी रिपोर्ट प्रधानाचार्य से आगे नहीं जा सकी। उसे दबा दिया गया। मजेदार बात यह है कि उच्चाधिकारियों द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने पर प्रधानाचार्य ही प्रमुख अधीक्षक को रिपोर्ट देने के लिए निर्देशित करते लेकिन जब उनके द्वारा रिपोर्ट दी जाती तो उसे दबा दिया जाता है। इतना ही नहीं जालसाजी करने वाले सगे भाइयों को बचाने के लिए कुछ अधिकारियों ने लखनऊ तक दौड़ भाग की। यहां समझना होगा कि जिन लोगों पर मामले में न्याय संगत कार्यवाही करने का दायित्व है वही न जाने क्यों जालसाजों पर मेहरबान हैं।
*सफाई कर्मी को दी जान से मरवा देने की धमकी*
जालसाजी के आरोपी हेमंत और पवन ने नैनी के जिस मकान का पता अपने दस्तावेजों में खुद का बताया है वह वास्तव में स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय के ही सफाई कर्मी रहे स्वर्गीय ननकू लाल का है। जब ननकू को इस बात की जानकारी हुई कि जालसाज भाइयों ने नौकरी पाने के लिए उसके घर के पते को अपने पते के रूप में दिखाया है तो उसने विरोध किया। इस पर जालसाजों ने उसे व उसके बेटे को जान से मरवा देने और अस्पताल में नौकरी न करने देने की धमकी दी। ननकू लाल ने अस्पताल के अधीक्षक से जालसाजी और अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की शिकायत लिखित में की थी। लेकिन कुछ नहीं हुआ।
*महिला लिपिक का कराया तबादला*
पूरे मामले में एक और हैरतअंगेज बात सामने आई है की उच्चाधिकारियों द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने पर अस्पताल की जिस महिला लिपिक ने हेमंत और पवन की जालसाजी का खुलासा करते हुए रिपोर्ट तैयार की न सिर्फ उसका तबादला करा दिया गया बल्कि आनन-फानन में उससे सरकारी आवास भी खाली करा लिया गया। परेशान करने की नियत से फतेहपुर की रहने वाली महिला को सीएमओ ऑफिस फतेहपुर में तैनाती की बजाय सीएमओ ऑफिस प्रयागराज में कराई गई ताकि वह आने-जाने में परेशान हो। जालसाजों और उनके आकाओं की पहुंच का अंदाजा इस घटना से भी लगाया जा सकता है।
*महानिदेशक से बदलवायी जाति*
जालसाज भाइयों ने महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा से अभिलेखों में अपनी जाति बदलवा ली। अनुसूचित जाति से सवर्ण सिन्हा जाति के हो गए। जबकि नियुक्ति आदेश में इनकी जाति अनुसूचित दर्ज है। सेवा पुस्तिका के प्रथम पृष्ठ पर दोनों के नाम कुछ और ही लिखे हैं।
*सीएम तक शिकायत फिर भी बीत गए 25 साल*
जालसाजी के इस मामले की शिकायत प्रशासन और शासन दोनों स्तर पर की गई। मामला मुख्यमंत्री तक गया लेकिन परिणाम शून्य रहा। शिकायत दर शिकायत और पत्र दर पत्र मे 25 वर्ष बीत चुके हैं। अब भी शिकायत, पत्र और रिपोर्ट वाला खेल जारी है। देखिए कब तक चलता है।



