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पिता कंधे पर बैठ मेले में जाऊँ

बरगद की छांव बीच भँवर से किनारे पर लाती नाँव है। पिता कंधे पर बैठ मेले में जाऊँ मन ही मन इतराउं देख खिलौना जो मचल जाऊँ तुरंत ही दिलवाते स्वावलंबन का पाठ पढ़ाते पिता जीवन संग्राम में विजयी बनना सिखाते पिता संघर्ष है संतोष है कठोर भी है पर नारियल जैसे
स्वयं से स्वयं का परिचय भी हैं पिता

( ज्योती श्रीवास्तव / अनुराग दर्शन समाचार )

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