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आओ मिलते है क्षितिज पर धरती – अम्बर बनकर

कभी होटो में हंसीं , कभी आंखों में शबनम बनकर , कभी चेहरे की चमक , कभी बालो में रेशम बनकर ,
हाँ तुम्ही रहते हो हरदम मेरे हमदम बनकर
आओ……
लाख जख्म भी नही दुखते अब मुझे देखो, हर याद तुम्हारी हंसा जाती है मरहम बनकर,
आओ………
छू लूं चाहे जमाने की लाख ऊंचाइयां,
खेलना चाहती हूं तुम्हारे साथ मैं बचपन बनकर,
आओ…..
कर नही सकता कोई उस ओस की बूंद से मुकाबला,
लाख बरसे कोई झूमता सावन बनकर,
आओ……
बिन किये इश्क की फितरत ना जान पाएंगे ,
उम्र भर तोलते राह जाएंगे पैमाना बनकर,
आओ मिलते है क्षितिज पर धरती अम्बर बनकर
( “जूही जायसवाल”- अनुराग दर्शन डॉट कॉम )

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