( अनुराग शुक्ला )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। आज समाज में पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़ता बच्चों का रुझान, माँ बाप का स्वयं पर केंद्रित जीवन, संस्कार देने के लिए समय का अभाव, एकल परिवार की वजह से जिम्मेदारी का अधिक बोझ , रिश्तेदारों से ज्यादा हम उम्र दोस्तों के साथ अत्यधिक समय बिताना ऐसे कई परिस्थितियों के सम्मिश्रण ने संस्कार के ग्राफ को उतार कर रख दिया है।
उक्त बातें बताते हुए आचार्य त्रिभुवन नाथ शुक्ला ने कहा कि इन तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता है। बच्चों से समाज और देश का भविष्य है और संस्कारों की नींव को बचपन से ही इतनी मजबूती और दृढ़ता के साथ रोपित किया जाना चाहिए । कि बच्चा किसी भी परिस्थिति में डगमगा कर अपने संस्कारों की धज्जियाँ न उड़ाये।छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से बड़े-बड़े संस्कार को जीवन में शामिल होने का रास्ता मिलता है।वही आचार्य त्रिभुवन नाथ शुक्ला ने बताया अपनी दिनचर्या में सुबह उठते ही अपनी हथेलियों का दर्शन, धरती माँ को स्पर्श और अपने घर के बुजुर्गों या माँ-बाप को प्रणाम करना,ईश्वर का नमन करके स्कूल जाना इत्यादि दिन के शुरुआत से ही सबसे पहले नाजुक और कोमल संस्कार को जन्म देते हैं। प्रत्येक बच्चा कच्ची मिट्टी के समान होता है, उसे जैसा चाहे वैसा ढाला जा सकता है।



