पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने माँ गंगा से राष्ट्र की समृद्धि, विश्व मांगल्य की प्रार्थना की

आज ही सृष्टि के सबसे बड़े वैज्ञानिक के रूप में जाने जाने वाले ब्रह्मदेव ने मनुष्य के कल्याण हेतु ज्ञान विवेक की जननी माता सरस्वती का किया प्राकट्य
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार ) । आज बसंत पंचमी के पर्व पर त्रिवेणी संगम में स्नान कर श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने माँ गंगा का पूजन किया | पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने माँ गंगा से राष्ट्र की समृद्धि, विश्व मांगल्य, दुष्टों के दमन तथा मानवता के संरक्षण एवम सम्बर्धन की प्रार्थना की | पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि आज के ही दिन सृष्टि के सबसे बड़े वैज्ञानिक के रूप में जाने जाने वाले ब्रह्मदेव ने मनुष्य के कल्याण हेतु बुद्धि, ज्ञान विवेक की जननी माता सरस्वती का प्राकट्य किया था। मनुष्य रूप में स्वयं की पूर्णता के परम उद्देश्य का साधन मात्र और एक मात्र भगवती सरस्वती के पूजन का ही है। इसलिए, आज के ही दिन माताएं अपने बच्चों को अक्षर ज्ञान आरंभ भी कराना शुभप्रद समझती हैं। आज ही के दिन पृथ्वी की अग्नि, सृजन की तरफ अपनी दिशा करती है। जिसके कारण पृथ्वी पर समस्त पेड़ पौधे फूल मनुष्य आदि गत शरद ऋतु में मंद पड़े अपने आंतरिक अग्नि को प्रज्जवलित कर नये सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। स्वयं के स्वभाव प्रकृति एवं उद्देश्य के अनुरूप प्रत्येक चराचर अपने सृजन क्षमता का पूर्ण उपयोग करते हुए, जहां संपूर्ण पृथ्वी को हरी चादर में लपेटने का प्रयास करता है, वहीं पौधे रंग—बिरंगे सृजन के मार्ग को अपनाकर संपूर्णता में प्रकृति को वास्तविक स्वरूप प्रदान करते हैं। इस रमणीय, कमनीय एवं आदर्श ऋतु में पूर्ण वर्ष शान्त रहने वाली कोयल भी अपने मधुर कंठ से प्रकृति का गुणगान करने लगती है | भारतीय ज्योतिष में प्रकृति में घटने वाली हर घटना को पूर्ण वैज्ञानिक रूप से निरूपित करने की अद्भुत कला है। मूल रूप से शरद ऋतु के ठंड से शीतल हुई पृथ्वी की अग्नि ज्वाला, मनुष्य के अंत:करण की अग्नि एवं सूर्य देव के अग्नि के संतुलन का यह काल होता है। यह मात्र वह समय है (बसंत ऋतु) जहां प्रकृति पूर्ण दो मास तक वातावरण को प्राकृतिक रूप से वातानुकूलित बनाकर संपूर्ण जीवों को जीने का मार्ग प्रदान करती है। पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के साथ स्वामी बृजभूषणानन्द जी महाराज, स्वामी प्रपन्नाचार्य जी महाराज, दिनेश द्विवेदी, शशांक धर द्विवेदी आदि ने भी संगम स्नान किया |




