आखिर शहर से दूर अंदावा में बने तालाब में प्रतिमाओं का विसर्जन क्यों करवाया गया।

वर्ष 2019 में संगम कालीमार्ग पर बाढ़ का पानी था 2020 में कोरोनाकाल के बाद हल्की छूट, लेकिन इस बार ऐसा क्यों?
प्रयागराज। शारदीय नवरात्र सकुशल संपन्न हो गया। एक सवाल बार-बार उठता है कि शहर की बारवारियों व पूजा पण्डालों में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा समेत अन्य प्रतिमाओं का विसर्जन संगम स्थित काली मार्ग पर बने कृतिम तालाब में न कराकर शहर से पंद्रह बीस किलोमीटर दूर अंदावा मोड़ हाइवे से भी लगभग दो तीन किलोमीटर दूर गांव जहां की सड़क भी काफी संकरी है ,और उसी संकरी सड़क पर प्रतिमाओं से लदे अनगिनत वाहनों की कतार और हजारों की संख्या में विसर्जन में के लिए आयी भीड़-भाड़ का एक बड़ा रेला उस पर सड़क किनारे खेतों में लगे कटीले तार व जंगली बबूल के पेड़ों की झाड़ एक बहुत बड़ी दुर्घटना को दावत देने के लिए काफी हैं। जरा सी चूक से यदि भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती तो पुलिस प्रशासन भी उसे रोकने में बौना साबित हो जाता।संगम में बनाये गये कृत्रिम तालाब पर पहले से ही उसे दुरुस्त क्यों नहीं किया गया आखिर शहर से इतनी दूर अंदावा में बने तालाब में हजारों प्रतिमाओं का विसर्जन क्यों करवाया गया? आखिर क्या खासियत देखी प्रशासन ने अंदावा में सीधे तौर पर प्रोटोकॉल का खुला उल्लंघन किया गया और हजारों की संख्या में विसर्जन में शामिल लोगों की जान जोखिम में डालने का प्रयास बड़ा अजीब लग रहा होगा पढ़कर कि हजारों लोगों की जान जोखिम में डालने का भला प्रतिमाओं के विसर्जन से क्या लेना-देना? वाकई अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है जो प्रशासन की दूरदर्शिता अथवा अदूरदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह उठाता है। चूंकि कोरोनावायरस का खात्मा अभी पूरी तरह से नहीं हुआ है । फिर भी भीड़-भाड़ वाले स्थान पर प्रतिमाओं का विसर्जन करवाया गया जो कहीं से तर्कसंगत नहीं है। जबकि बंगाली वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव पीके राय द्वारा वर्ष 2015 में दाखिल याचिका को संज्ञान में लेते हाईकोर्ट ने 5 अक्टूबर 2015 को दशहरा पर्व पर पूजा पण्डालों में स्थापित प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए संगम क्षेत्र में गंगा किनारे रामघाट के समीप स्थित काली मार्ग पर बने कृत्रिम तालाब में कराये जाने का आदेश दिया था।
हाईकोर्ट के आदेश की खबर शहर के सभी चर्चित समाचार पत्रों में प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुई थी। फिर ऐन वक्त पर आदेश को दरकिनार करते हुए आनन फानन में दलील देते हुए प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा यह निर्णय लिया गया कि संगम किनारे रामघाट के समीप स्थित काली मार्ग पर बने कृत्रिम तालाब में शहर की पूजा पण्डालों में स्थापित प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं होगा, क्योंकि उसकी स्थिति ऐसी नहीं है कि उसमें प्रतिमाओं का विसर्जन करवाया जा सके।
प्रतिमाओं के विसर्जन से ठीक दो एक दिन पूर्व उच्चाधिकारियों के द्वारा अचानक अंदावा स्थित तालाब का निरीक्षण किया किया गया और वहीं प्रतिमाओं का विसर्जन करने का फैसला लिया व आदेश जारी कर दिया गया कि अंदावा में ही विसर्जन की प्रक्रिया की जाएगी। जो कि किसी भी नजरिये से उचित नहीं था।
शहर के पण्डालों में स्थापित प्रतिमाओं का विसर्जन संगम स्थित तालाब में ही कर करवाया जाता तो ठीक था। पर गंगापार के लोग अंदावा में विसर्जन करते और शहर वाले काली मार्ग पर बने कृत्रिम तालाब में विश्वविख्यात संगम में जहां माघ मेला और कुंभ मेला में लाखों लोगोें की भीड़ का रेला उमड़ने के बावजूद भी पता नहीं चलता कि तम्बुओं की इस नगरी में श्रद्धालुओं एवं संतों की अनगिनत संख्या है इतना विशाल मैदान कि एक नयी दुनियां ही एक डेढ़ महीने के लिए बस जाती है । और किसी को किसी भी प्रकार की असुविधा भी नहीं होती।
तो कहने का तात्पर्य यह है कि इतना बड़ा रिस्क बुद्धिजीवियों के द्वारा क्यों लिया गया। थोड़ी देर के लिए मान लिया जाये कि अंदावा गांव में भारी भरकम भीड़ देख यदि कोई जानवर या जानवरों का हुजूम भड़क उठता और लोग उनकी चपेट में आ जाते तो क्या होता? सीधे तौर पर एक बहुत बड़ी दुर्घटना जिसकी जवाब देही होती या फिर लीपापोती मार्ग दुर्घटना को भी इस कड़ी में जोड़ा जा सकता है ।अंदावा के मुख्य मार्ग पर विसर्जन के वाहनों के साथ साथ दूर दराज से आने जाने वाले में भरी सवारियों के वाहन भी बड़ी संख्या में रेंग रेंग कर चल रहे थे और उन्हीं वाहनों से सटकर विसर्जन में शामिल हजारों की संख्या में बाइक सवार चल रहे थे । उनमें अनेकों युवा नशे में धुत्त भी थे ।जरा सी चूक से जानमाल दोनों का ही खतरा बना रहता है। माना वर्ष 2019 में संगम क्षेत्र में बने कृत्रिम तालाब में प्रतिमाओं विसर्जन इस लिए नहीं हो सका था। क्योंकि बाढ़ का पानी भरा था,2020 में कोरोना देखते हुए तीन महीने के लाकडाउन के बाद हल्की फुल्की छूट दी गई थी शारदीय नवरात्र पर पूजा पण्डाल भी शासनादेश पर 15 फिट से अधिक नहीं बनाये गये थे या यूं कह लें क्या शहर क्या अंचल इलाकों में पण्डालों की संख्या सीमित थी,पूर्व की भांति या इस वर्ष की अपेक्षा पूजा पण्डालों की संख्या न के बराबर ही रही शासन का भी कड़ा आदेश था । कि पूजा पण्डालों 5 से अधिक लोग बिना मास्क प्रवेश नहीं करेंगे वह शारीरिक दूरी बनाते हुए गोले के अंदर एक दायरे में। प्रतिमाओं का आकार भी छोटा था यानि ढाई फिट से अधिक नहीं था।प्रतिमा विसर्जन में के दौरान अधिक भीड़भाड़ लेकर जाने सख्ती थी। इसलिए पिछले दो सालों से विसर्जन अंदावा में करवाया जाना प्रशासनिक मजबूरी थी। लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं था फिर भी अंदावा में यह प्रक्रिया पूरी करवायी गई। जिसे सही कदम नहीं ठहराया जा सकता।अगले वर्ष यदि सबकुछ ठीकठाक रहा तो अंदावा में प्रतिमाओं के विसर्जन करवाये जाने से पूर्व इस बात को शासन प्रशासन दोनों को ही ध्यान में रखना होगा।
किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचने के लिए अभी से एक ठोस रणनीति व कदम उठाना होगा।
ताकि नागरिकों व शासन प्रशासन लिए हितकारी साबित होगा।
क्योंकि एक वर्ष बीतने में अधिक समय नहीं लगता देखते ही देखते साल गुजर जाता है और फिर त्योंहारों का सीजन शुरू हो जाता है।




