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महंत बजरंगमुनि उदासीन ने बताया तन्त्र और मंत्र का महत्व

प्रयागराज।  माँ बंगलामुखी उपासक महंत बजरंगमुनि उदासीन ने बताया कि तन्त्र का शाब्दिक उद्भव इस प्रकार माना जाता है – “तनोति त्रायति तन्त्र”। जिससे अभिप्राय है – तनना, विस्तार, फैलाव इस प्रकार इससे त्राण होना तन्त्र है।।
अध्यात्म का गौरवशाली साहित्य दो भागों में विभक्त है-’आगम’ और ‘निगम’। सामान्यतया आगम तंत्र के लिए और निगम वेदों के लिए प्रयुक्त होता है। वेदों की महत्ता तो सर्वविदित है ही, तंत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण उच्चकोटि के साहित्य में गिने जाते हैं


यह शास्त्र तीन भागों में विभक्त है— आगम, यामल और मुख्य तंत्र । वाराही तंत्र के अनुसार जिसमें सृष्टि, प्रलय, देवताओं की पूजा, सब कार्यों के साधना, पुरश्चरण, षट्कर्म- साधन और चार प्रकार के ध्यानयोग का वर्णन हो, उसे आगम कहते हैं। जिसमें सृष्टितत्व, ज्योतिष, नित्य कृत्य, क्रम, सूत्र, वर्णभेद और युगधर्म का वर्णन हो उसे यामल कहते हैं, और जिसमें सृष्टि, लट, मंत्रनिर्णय, देवताओं, के संस्थान, यंत्रनिर्णय, तीर्थ, आश्रम, धर्म, कल्प, ज्योतिष संस्थान, व्रत-कथा, शौच और अशौच, स्त्री-पुरूष-लक्षण, राजधर्म, दान- धर्म, युवाधर्म, व्यवहार तथा आध्यात्मिक विषयों का वर्णन हो, वह तंत्र कहलाता है ।

यहाँ पर तन्त्र साधना से अभिप्राय “गुह्य या गूढ़ साधनाओं” से किया जाता रहा है।।तन्त्रों को वेदों के काल के बाद की रचना माना जाता है जिसका विकास प्रथम सहस्राब्दी के मध्य के आसपास हुआ। साहित्यक रूप में जिस प्रकार पुराण ग्रन्थ मध्ययुग की दार्शनिक-धार्मिक रचनायें माने जाते हैं उसी प्रकार तन्त्रों में प्राचीन-अख्यान, कथानक आदि का समावेश होता है।

वैसे तो तन्त्र ग्रन्थों की संख्या हजारों में है, किन्तु मुख्य-मुख्य तन्त्र 64 कहे गये हैं। तन्त्र का प्रभाव विश्व स्तर पर है। इसका प्रमाण हिन्दू, बौद्ध, जैन, तिब्बती आदि धर्मों की तन्त्र-साधना के ग्रन्थ हैं। भारत में प्राचीन काल से ही बंगाल,असम, बिहार,हिमाचल और राजस्थान तन्त्र के गढ़ रहे हैं।।कलयुग में सब प्रकार के कार्यों की सिद्धि के लिये तंत्राशास्त्र में वर्णित मंत्रों और उपायों आदि से ही सहायता मिलती है ।

इस शास्त्र के सिद्धान्त बहुत गुप्त रखे जाते हैं और इसकी शिक्षा लेने के लिये मनुष्य को पहले दीक्षित होना पड़ना है । आजकल प्रायः मारण, उच्चाटन, वशीकरण आदि के लिये तथा अनेक प्रकार की सिद्धियों आदि के साधन के लिये ही तंत्रोक्त मंत्रों और क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है । यह शास्त्र प्रधानतः शाक्तों का ही है और इसके मंत्र प्रायः अर्थहीन और एकाक्षरी हुआ करते हैं । जैसे,— ह्नीं, क्लीं, श्रीं, स्थीं, शूं, क्रू आदि । तांत्रिकों का पंचमकार— मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन — और चक्रपूजा प्रसिद्ध है । तांत्रिक सब देवताओं का पूजन करते हैं पर उनकी पूजा का विधान सबसे भिन्न और स्वतंत्र होता है ।।

महंत बजरंगमुनि उदासीन ने बताया कि तन्त्र की तीन परम्परायें मानी जाती हैं –
शैव आगम या शैव तन्त्र,
वैष्णव संहितायें, तथा
शाक्त तन्त्र एवम तन्त्र की तीन परम्परायें मानी जाती हैं –
शैव आगम या शैव तन्त्र,
वैष्णव संहितायें, तथा
शाक्त तन्त्र।।
भारतीय परम्परा में आगमों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन मन्दिरों, प्रतिमाओं, भवनों, एवं धार्मिक-आध्यात्मिक विधियों का निर्धारण इनके द्वारा हुआ है।।जब कभी तंत्र-साधना का प्रचार उच्चशिखर पर था, साधक इससे अनेकों प्रकार की असाधारण सिद्धियाँ प्राप्त करते थे, जो आज सर्वथा असंभव दृष्टिगोचर होती हैं। प्राचीन काल के साधक इससे बड़े-बड़े लाभ उठाते थे। रावण और अहिरावण हजारों मील की दूरी से बिना वैज्ञानिक यंत्रों के आपस में वार्तालाप करते थे।

नल-नील ने पानी पर तैरने वाले पत्थरों से पुल बनाया था। हनुमान मच्छर की तरह छोटा बन सकते थे और बृहदाकार पर्वत खंडों को उठाने की सामर्थ्य भी रखते थे। सुरसा अपने शरीर को विशालतम बना सकती थी।

मारीच मनुष्य शरीर को पशु-शरीर में परिवर्तित कर लेता था। बिना पेट्रोल के आकाश में उड़न वाले वायुयान उपलब्ध थे। वरुण-अस्त्र से जल की वर्षा कराई जाती थी, आग्नेयास्त्र से चारों ओर अग्नि की लपटें उठने लगती थीं, नागपाश की जकड़ लोहे की मोटी रस्सियों से भी अधिक सुदृढ़ थी। सम्मोहनास्त्र से व्यक्ति को मूर्छित कर दिया जाता था। आज यह विद्या लुप्त हो गयी और उसे मात्र ग्रंथों में ही पढ़ा जा सकता है।

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