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शिव को जाने बिना इस लोक को जानना असम्भव है- शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद

नेपाल ( अनुराग दर्शन समाचार )। नेपाल के कास्की (पोखरा) जनपदान्तर्गत पुम्दीकोट वार्ड २८ में एशिया महाद्वीप का सबसे ऊँचाई पर एवम् सबसे विशाल शिव मूर्ति की स्थापना का कार्य सम्पन्न होने के पश्चात् सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर यति सम्राट् अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने उद्घाटन किया | इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा में पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि भगवान शिव ही विष्णु हैं, और भगवान विष्णु ही शिव हैं | दोनों में कोई भेद नहीं है | पूरी दुनिया में भगवान शिव की ही पूजा भिन्न-भिन्न नाम एवम् रूपों में होती है | जहाँ भी सत्य है, वहीं शिव का वास है। शिव के साथ सारी विषमता है। वे औघड़ हैं, आशुतोष हैं, देवों में महादेव हैं, रुद्र हैं, गृहस्थ हैं, महायोगी हैं, त्यागी और तपस्वी हैं, पिता हैं, गुरु हैं, मृत्यु और जीवन हैं। सनातनी होने का अर्थ है, शिव को जानना। शिव को जाने बिना इस लोक को जानना असम्भव है। उनकी आराधना से मोक्ष मिलता है। वे ज्ञान का वेद हैं, वे रामायण के प्रणेता हैं, संगीत के स्वर हैं, ध्यान के उत्स हैं। उनमें नृत्य वास करता है, जीवन को गति मिलती है। वे प्रेमी हैं, ऋषियों के गुरु हैं, देवताओं के रक्षक हैं, असुरों के सहायक हैं और मानवों के आदर्श हैं। सभ्यता के उषा काल में शिव और पार्वती विज्ञान के धरातल पर काल चिंतन करते है। ज्ञान के शिखर पर बैठकर संतुलन एवं सत्य के विविध रूपों को खोजना कोई महायोगी और योगिनी ही कर सकते हैं। शिव जो भी बोलते हैं, वह जीवन के सूत्र हैं। शिव के हृदय में संसार नहीं हैं, वासना नहीं है और अंधेरा भी नहीं है। उनका जीवन ही प्रकाश है। अब प्रकाश होगा, तो सदैव ही प्रेम, करुणा, साधना एवं भक्ति रहेगी। अंतस के जागरण के लिए शिवतत्त्व की जरूरत है। अंतस एक बार चैतन्य हो गया, तो सब कुछ बदल जाता है। आचरण ही साधना बन जाती है। हरेक शब्द प्रेम पूर्ण एवम् कर्म के प्रत्येक चरण करुणापूर्ण हो जाते हैं। साधुता ही स्वभाव बन जाता है। भीतर जब आलोकित हो, तो बाहर सदैव ही प्रकाश रहेगा। शिव का आकार शून्य व ज्योति स्वरूप है।

पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि स्थान पूर्णतः धाम है, जो सदा सर्वदा यहाँ आकर भगवान शिव जी की आराधना करने वाले भक्तों की हर मनोकामना की पूर्ति करेगा। इस धाम के निर्माण में चन्द्रकान्त बराल एवम् उनके सहयोगियों की प्रशंसनीय भूमिका रही है | भगवान इन सभी लोगों को शक्ति एवम् सामर्थ्य दें, ताकि ये इसी प्रकार सनातन धर्म की सेवा करते रहें | धर्म मंच पर स्वामी बृजभूषणानन्द सरस्वती जी महाराज, विष्णु प्रसाद बराल, जय प्रकाश त्रिपाठी, प्रभाकर त्रिपाठी सहित नेपाल के अन्य गणमान्य व्यक्तित्व तथा सभागार में हजारों श्रद्धालु उपस्थित थे ।

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