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माँ बगलामुखी प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव में पधारे सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु

यही एक मात्र देवी हैं, जिनके मुकुट पर अर्धचंद्र और लालट में तीसरा नेत्र है- शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद

रोपड़ (अनुराग दर्शन समाचार )। कुराली रोड, जिला-रोपड़ (पंजाब) में जूना अखाड़ा के जगद्गुरु स्वामी पंचानन्द गिरि जी महाराज के शिष्य प्रवीण कुमार द्वारा स्थापित माँ बगलामुखी प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव में पधारे सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा में कहा कि दस महाविद्याओं में देवी बगलामुखी को प्रथम स्थान प्राप्त है | यही एक मात्र देवी हैं, जिनके मुकुट पर अर्धचंद्र और लालट में तीसरा नेत्र है। यही कारण है कि महाकाल शिवजी की यह अति प्रिय हैं। यह शक्तिरूपा विष्णु के तेज से युक्त होने के कारण वैष्णवी हैं। इनकी आराधना से दैवी प्रकोप और शत्रु से रक्षा तथा शान्ति, सुख-समृद्धि, राज्यकृपा की प्राप्ति होती है। भोग और मोक्ष देनों देने वाली इन महाशक्ति देवी की उपासना से प्रत्येक दुर्लभ वस्तु प्राप्त की जा सकती है। इन्हें ब्रह्मास्त्र विद्या के अतिरिक्त पीतांबरा, त्रिनेत्री, खड्गधारिणी, श्री विद्या, देवी श्री त्रिपुर सुंदरी, विश्वेश्वरी, मातंगी आदि नामों से भी पुकारा जाता है | राम-रावण युद्ध में जब रावण के बड़े-बड़े योद्धा राक्षस मारे जा चुके थे, तब रावण के पुत्र मेघनाद ने स्वयं रणभूमि में जाने का फैसला किया। रणभूमि में जाने से पहले उसने शत्रु के शमन के लिए और अपने पिता दशानन रावण की जीत सुनिश्चित करने के लिए इस शक्ति स्वरूपा देवी माता श्री बगलामुखी का आवाहन और अनुष्ठान निर्जन एकांत स्थान में शुरू किया | इस अनुष्ठान की निर्विघ्न समाप्ति के लिए सभी प्रमुख दानवों को तैनात कर दिया गया था। उन्हें आदेश था कि जो इस यज्ञ को हानि पहुंचाने की चेष्टा करे, उसका वध कर दिया जाए। इसके साथ ही मेघनाद ने पूरे आत्मविश्वास, उत्साह और पूरी श्रद्धा के साथ अनुष्ठान आरंभ कर दिया। परंतु विष्णु अवतार श्री रामचंद्र जी को इसका आभास हो गया कि अगर माता बगलामुखी इस यज्ञ के बाद जागृत हो उठीं तो वह काली का रूप धारण करके वानर सेना का विनाश कर देंगी, और उनके साथ चलने वाली योगिनियां उनके योद्धाओं का खून पी जाएंगी। इस शंका के चलते उन्होंने अपने परम भक्त हनुमान, बाली पुत्र अंगद आदि को उसका यज्ञ भंग कर देने की आज्ञा दी। श्री राम की आज्ञा का पालन करते हुए दोनों योद्धा अपने प्रमुख वानर यूथपालों को लेकर उस गुप्त जगह पर छद्म वेश धारण करके पहुंच गए और महा पराक्रमी इंद्रजीत का यज्ञ अनुष्ठान पूरा होने से पहले ही भंग कर दिया। अगर मेघनाद का वह यज्ञ पूरा हो जाता तो श्री राम का लंका पर विजय पाना कठिन हो जाता। तात्पर्य यह कि शक्तिस्वरूपा देवी बगलामुखी साधक के सभी शत्रुओं का पूरी तरह से शमन कर देती हैं । माता बगलामुखी की पूजा में सारी सामग्री पीली ही होनी चाहिए। साधक को पीले वस्त्र ही धारण करने चाहिए। जप माला भी हल्दी की गांठों की होनी चाहिए। जप पीत आसन पर बैठकर ही करना चाहिए और नित्य पीत पुष्पों से ही देवी का पूजन करना चाहिए। इस तरह अयुत जप के बाद हल्दी व केसर से रंजित साकल्य से दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण तथा तद्दशांश मार्जन किया जाता है। और केसरिया या वेसनी मोदक आदि पदार्थ से मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए | पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि माँ बगलामुखी का अनुष्ठान करने से अशुभ प्रभाव का शमन, शत्रु पर विजय, दैवी प्रकोपों से मुक्ति, धन की प्राप्ति, दारिद्र्य और ऋण से मुक्ति, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण आदि अनेक कार्यों की सिद्धि होती है। अशोक और करवीर के हवन से पुत्र की प्राप्ति होती है। सेमर के फलों के हवन से शत्रु पर विजय मिलती है। गुग्गुल और घी से हवन करने पर राजवश्यता होती है। गुग्गुल और तिलों के मिश्रण हवन करने से कैदी छूट जाता है। यहाँ माँ बगलामुखी की प्राण-प्रतिष्ठा आज हो गई है, यहाँ आने वाले अपने सभी भक्तों की हर मनोकामना निश्चित रूप से पूर्ण होगी | धर्म मंच पर जूना अखाड़ा के जगद्गुरु स्वामी पंचानन्द गिरि जी महाराज, स्वामी तूफान गिरि जी महाराज, स्वामी नित्यानन्द जी महाराज, स्वामी बृजभूषणानन्द सरस्वती जी महाराज, प्रवीण कुमार,मनप्रीत सोढ़ी सहित अन्य सन्त-महात्मा एवम् पण्डाल में हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे |

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