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नागरिकों को धार्मिक न्याय दिलाने हेतु भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘धार्मिक न्याय’ शब्द जोड़ा जाये-अजीत भाष्कर

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। आज राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी द्वारा भारत के संविधान की प्रस्तावना में ‘धार्मिक न्याय’ शब्द जोड़ने के लिए माननीय राष्ट्रपति को जिलाधिकारी, प्रयागराज के मध्यम से ज्ञापन सौंपा गया।
इस अवसर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट अजीत भाष्कर ने कहा कि भारत के संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष शब्द संशोधित कर जोडा गया है। धर्म ही वह आधार है जिस पर हर व्यक्ति का जीवन टिका हुआ है। इसलिए यह तय है कि व्यक्ति अपने जीवन में धर्म से जुड़कर तो रहेगा ही, परंतु सार्वजनिक जीवन में वह पंथनिरपेक्ष रह कर कार्य करेगा।
आगे श्री भाष्कर ने कहा कि संविधान के अनुसार भारत एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है। लेकिन यहां पर मंदिर बनाने के लिए जगह ढूंढने से लेकर मंदिर बनाने का खर्च कहां से आएगा, कैसे जुटाया जाएगा, कौन मंदिर बनाएगा, कैसे बनाएगा, उससे संबंधित तमाम तरह की बातों का निर्णय सरकार करती है जिसमें शामिल सभी लोग अपने पद और गोपनीयता की शपथ लेते के समय संविधान को अक्षुण्ण बनाए रखने की शपथ लेते हैं लेकिन भारत की पंथनिरपेक्षता के कानून को वह स्वयं ही तोड़ते हैं। तमाम तरह के धार्मिक आयोजन जिसमें मेले और बड़े-बड़े तीर्थ स्थानों पर लगने वाले समागम सरकारी खर्च पर अंजाम दिए जाते हैं और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग करके हमारे जनप्रतिनिधि इन मेंलो और धार्मिक आयोजनों में शामिल होते हैं। किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म को मानने उसका प्रचार-प्रसार करने और बढ़ाने का अधिकार भारत का संविधान देता है। किंतु अपने धर्म को मानने व उसको बढाने के साथ ही अन्य धर्म के मानने वालों की भावनाओं को खंडित करते हैं तो इससे संविधान के प्रति उनकी आस्था खंडित होती है। व्यक्तिगत श्रद्धा भावना से अपने धार्मिक स्थलों पर शासकीय खर्चे पर जाना, शासन की शक्तियों का दुरुपयोग करके आयोजन में सरकारी शक्ति अथवा धन का उपयोग करना संविधान विरुद्ध कार्य है। अब धार्मिक कर्मकांडों में सरकार का हस्तक्षेप इतना अधिक हो गया है जिससे जनता को असुविधा भी होने लगी है। उदाहरण के तौर पर समय-समय पर निकलने वाले जुलूस और उनमें शामिल होने वाले राजनीतिज्ञों के प्रभाव के कारण उनकी इंतजामिया कमेटी के लोग जनता के आराम की परवाह न करते हुए आवागमन के रास्तों को पूरी तरह से बंद कर देते हैं और जुलूसों को लेकर इस प्रकार चलते हैं जिससे जनता भयाक्रांत होकर घर के अंदर दुबक जाने को बाध्य हो जाती है। इस प्रकार का शक्ति प्रदर्शन प्रजातांत्रिक देश में धर्म के नाम पर उचित नहीं कहा जा सकता । पिछले कुछ वर्षों में होने वाली घटनाओं का अगर अध्ययन किया जाए तो यह भी देखने में आया है कि भारत के प्रभावशाली राजनीतिज्ञ और जनप्रतिनिधि किसी एक खास धर्म को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे धर्म का अनादर भी करने लगे हैं। चुनाव में मंचों पर नफरत फैलाने के लिये भड़काऊ भाषण देना अब आम होता जा रहा है इससे पंथनिरपेक्षता की भावना पूरी तरह खंडित हो जाती है, इसलिए अब पंथनिरपेक्षता के साथ ‘धार्मिक न्याय’ शब्द को जोड़ना आवश्यक हो जाता है। इस अवसर पर प्रदेश अध्यक्ष मोहन धनराज ने कहा कि यहां की सांस्कृतिक सांझी विरासत के कारण ये देश पूर्व का सौंदर्य है जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैन और कितने ही धर्म के मानने वाले लोग, उनकी बोली बानी ,खान-पान पहनावा, धार्मिक रीति रिवाज, सब अलग होने के बावजूद एक अनदेखे कच्चे धागे से बंधे हुए हैं जो एक दूसरे का आदर करते हैं और एक दूसरे का सम्मान करते हैं। लेकिन जब शासन के स्तर पर इस सौंदर्य को खंडित कर तमाम रंगों को मिटा कर किसी एक रंग को गाढ़ा करने की बात आती है तब देश की जनता के अधिकारों का हनन होता है। यह हनन संविधान विरुद्ध है। इसे रोकने का एक ही रास्ता है कि संविधान की प्रस्तावना के मूल पाठ में पंथनिरपेक्षता के साथ  धार्मिक न्याय का भी उल्लेख होना चाहिए अन्यथा भारत में संविधान का ऐसे ही अपमान होता रहेगा और जनता को, उसके धर्म को मानने के अधिकार से वंचित किया जाता रहेगा। इसलिए राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी का मांग है कि संविधान के प्रस्तावना में “धार्मिक न्याय” शब्द जोड़ा जाना आवश्यक है। इस अवसर पर मुख्य रूप से राष्ट्रीय जन समर्थन पार्टी के जिलाध्यक्ष चंद्र प्रकाश निगम, एडवोकेट सन्तोष यादव, प्रदीप भारतीया, सरस्वती सरोज, आशीष पाल, आकाश कुमार, अनस सिद्दीकी, अशोक भारतीया, अमित कुमार, राशिद अली, बच्चा निषाद, रणजीत यादव, राज नारायण, जीत लाल, दीपू यादव, अनुज पाल, दया शंकर यादव, जीत लाल, अतुल यादव, गोलू पासी, मनीष पासी, सूरज, अरविंद व काफी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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