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भारतीय भाषाओं में हिन्दी ही वह भाषा है जो राष्ट्रीय स्तर की भाषा बनने की क्षमता रखती है – रविनंदन सिंह

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। हिन्दुस्तानी एकेडेमी उत्तर प्रदेश, प्रयागराज के तत्वावधान में बुधवार को अपराह्न हिन्दी दिवस के अवसर पर एकेडेमी परिसर के गाँधी सभागार में ‘भारतीय भाषाओं का परिप्रेक्ष्य और हिन्दी की भूमिका’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रारम्भ में एकेडेमी के सचिव देवेन्द्र प्रताप सिंह ने आमंत्रित अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शॉल देकर किया। इस अवसर पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘हिन्दुस्तानी’ के मलिक मुहम्मद जायसी अंक का विमोचन मंचासीन अतिथियों द्वारा किया गया।

अपने स्वागत संबोधन में एकेडेमी के सचिव देवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि ‘हिन्दी भाषा के शब्दों में अपनापन रहता है और हिन्दी भाषा से हम हिन्दुस्तानियों की संवेदनाएँ जुड़ी हैं। हिन्दी भाषा साहित्य के माध्यम से समाज को दिशा प्रदान करती है। अधिसंख्य भारतियों के बोलचाल की भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी का प्रचार प्रसार दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है।’ संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डॉ. इन्दीवर पाण्डेय (वाराणसी) ने कहा कि ‘ दुखद है कि आज 75 वर्षों के बाद भी भारत में हिन्दी अपनी वास्तविक स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकी है।

इसे राजनैतिक षडयंत्र ही कहना चाहिए कि भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी की प्रतियोगिता करा दी गई। जबकि भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी की प्रतियोगिता होनी चाहिए। यह बड़ा भ्रम है कि अंग्रेजी विश्वभाषा है। सच तो यह है कि रूसी चीनी जर्मन और हिन्दी के आगे अंग्रेजी कहीं नहीं टिकती।’ संगोष्ठी के सम्मानित वक्ता प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल (हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) ने कहा कि ‘डॉ.अमृतलाल की किताब 2010 में प्रकाशित हुई जिसमें लिखा गया है कि भारत सरकार उस समय से 16000 करोड़ रुपए राजभाषा के लिए खर्च कर रही है।

अब कितना खर्च होता होगा कह नहीं सकते। फिलहाल ग्लोबल भारत में हिन्दी की दशा एवं दिशा का आकलन कर सकते है’। संगोष्ठी के सम्मानित सरस्वती पत्रिका के सम्पादक एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री रविनदंन सिंह ‘यह एक स्वाभाविक तथ्य है कि भारतीय भाषाओं में हिन्दी ही वह भाषा है जो राष्ट्रीय स्तर की भाषा बनने की क्षमता रखती है। यह भी सच है कि एक न एक दिन हिन्दी यह स्थान अवश्य हासिल करेगी। हिन्दी की इस क्षमता को दो सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने भी समझ लिया था। सन 1801 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यह घोषणा की थी कि इंडियन सिविल सर्विसेज में उसी व्यक्ति को जिम्मेदार पदों पर नियुक्त किया जाएगा जिसे गवर्नर जनरल द्वारा बनाए गए कानूनों को अमल में लाने के लिए हिन्दी का ज्ञान हो।

इसीलिए अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने हिन्दी या हिन्दुस्तानी का ज्ञान प्राप्त किया।’ कार्यक्रम का संचालन एवं अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन एकेडेमी की प्रकाशन अधिकारी ज्योतिर्मयी ने किया । कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’, डॉ. शान्ति चौधरी, डॉ. उमा शर्मा, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’, परमानंद त्रिपाठी, डॉ. अमिताभ त्रिपाठी, डॉ. पूर्णिमा मालवीय, एम.एस. खान, राकेश वर्मा सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य विद्वान आदि उपस्थित रहे।

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